भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

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(198) अगस्त्य-संहिता

इमां स्वर्णमयीं रामप्रतिमां समलङ्कृताम्। इस स्वर्णमयी प्रतिमा को जो अलंकृत है------- अभावे सर्वरत्नानां हेम सर्वत्र योजयेत्।।56।। रुद्रबीजं परं पूतं यतस्तस्यैव सर्वदा। सभी प्रकार के रत्नों के अभाव में सभी स्थलों पर सुवर्ण का व्यवहार करें। या रुद्राक्ष परम पवित्र है, उसी का व्यवहार करें। सुवर्णं परमं दानं सुवर्णं दक्षिणा परा। सर्वेषामेव दानानां सुवर्णं दक्षिणेष्यते।।57।। सुवर्ण का दान श्रेष्ठ है और सुवर्ण दक्षिणा भी श्रेष्ठ है। सभी दानों में सुवर्ण दक्षिणा मानी जाती है। श्रद्धापूतः शुचिर्दान्तो दानं दद्यात् सदक्षिणम्। अदक्षिणन्तु यद्दानं तत्सर्वं निष्फलं भवेत्।।58।। श्रद्धा से पवित्र, पवित्र, मृदु स्वभाव वाले व्यक्ति दक्षिणा के साथ दान करें। बिना दक्षिणा का जो दान किया जाता है, वह सब निष्फल होता है देयद्रव्यतृतीयांशं दक्षिणां परिकल्पयेत्। अनुक्ते दक्षिणादाने दशांशं वापि शक्तितः।।59।। दान की गयी वस्तु की तेहाई दक्षिणा रखें। जहाँ दक्षिणा का उल्लेख न हो वहाँ दशांश अथवा शक्ति के अनुसार करें।] सप्तविंशोऽध्यायः सुतीक्ष्ण उवाच प्रायेण हि नराः सर्वे दरिद्राः कृपणाः मुने। असामर्थ्याद् विधानेऽस्मिन् कथन्तेषां विधिः प्रभो।।1।। सुतीक्ष्ण ने पूछा— हे मुनि अगस्त्य! सभी मनुष्य प्रायः दरिद्र और कृपण होते हैं। यदि इस विधान का सामर्थ्य उनमें न हो, तब वे कैसे आराधना करेंगे। अगस्त्य उवाच अशक्तो यो महाभाग तस्य वित्तानुसारतः। पलार्द्धेन तदर्द्धेन तदर्द्धार्द्धेन वा पुनः।।2।। वित्तशाठ्यमकृत्त्वैव कुर्यादितद् व्रतं मुने।