अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 260, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्तविंशोऽध्यायः (199) अगस्त्य बोले—हे महाभाग! जो सामर्थ्यहीन हों, वे धन के अनुसार पल का आधा, चौथाई, या अष्टमांश सुवर्ण से निर्मित प्रतिमा का दान करें। सम्पत्ति रहे तो बिना छुपाये तथा न रहे, तो भी दिखावटी भी नहीं करते हुए ही यह व्रत करें। यदि घोरतरादृष्टं यातनां¹ नेहते क्वचित् ।। 3 ।। अकिंचनोऽपि नियतं उपोष्य नवमीदिनम्। कृत्वा जागरणं भक्त्या रामभक्तैः समन्वितः ।। 4 ।। स्मरन् रामं धिया भक्त्या पूजयेद् विधिवन्मुने। यदि भाग्य अत्यन्त कठोर हो, फिर भी वे कष्ट का अनुभव न करें। जिसके पास कुछ भी नहीं हो, वह भी नियमपूर्वक नवमी में उपवास कर श्रीराम के भक्तों के साथ रात में जागरण कर श्रीराम का स्मरण करते हुए भक्तिपूर्वक पूजा करें। जपन् राममनुंमायारमानङ्गसमन्वितम् ।। 5 ।। एकाक्षरं वा विधिवत्सर्वन्यासकृतोन्नतिः । विधानपूर्वक सभी प्रकार के न्यासों से उन्नत होकर साधक श्रीराम के मन्त्र को माया (ह्रीं), रमा (श्रीं) और कामबीज (क्लीं) से संयुक्त कर अथवा एकाक्षर मन्त्र (रां) का जप करें। प्रातः स्नात्वा च विधिवत् कृत्वा सन्ध्यादिकाः क्रियाः ।। 6 ।। गो-भू-तिल-हिरण्यादि दद्याद् वित्तानुसारतः। श्रीरामचन्द्रभक्तेभ्यो विद्वद्भ्यः श्रद्धयान्वितः ।। 7 ।। प्रातःकाल विधिपूर्वक स्नान और सन्ध्यावंदन आदि क्रियाएँ कर धन- सम्पत्ति के अनुसार गाय, भूमि, तिल, सुवर्ण आदि श्रीराम के भक्त विद्वानों को श्रद्धापूर्वक दान करें। पारणं च प्रकुर्वीत ब्राह्मणैः सह भक्तितः । एवं यः कुरुते भक्त्या सर्वपापैः प्रमुच्यते ।। 8 ।। ब्राह्मणों के साथ भक्तिपूर्वक पारणा करें। ऐसा जो करते हैं, वे सभी पापों से मुक्त हो जाते हैं। प्राप्ते श्रीरामनवमीदिने मर्त्यो विमूढधीः। उपोषणं न कुरुते कुम्भीपाकेषु पच्यते ।। 9 ।।
- ग. पापानां।