अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ
पृष्ठ 261, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 261
(200) अगस्त्य-संहिता ———————————————————————————————————————————————— श्रीरामनवमी का दिन आने पर जो मूर्ख मनुष्य उपवास नहीं करते हैं, वे कुम्भीपाक नरक में पचते हैं। यत्किंचिद् रामममुद्दिश्य नो ददातिस्वशक्तितः। रौरवेषु स मूढात्मा पच्यते नात्र संशयः।।10।। अपनी शक्ति के अनुसार जो कुछ श्रीराम को लक्ष्य कर अपनी शक्ति के अनुसार दान नहीं करता है, वह मूर्ख रौरव नरक में पचता है, इसमें सन्देह नहीं। सुतीक्ष्ण उवाच यामाष्टकेषु पूजा वै त्वया प्रोक्ता महामुने। मूलमन्त्रेण चेत्युक्तं तत्कथं वद सुव्रत।।11।। हे महामुनि सुतीक्ष्ण! आपने आठो यामों में पूजा की जो विधि बतलायी है और यह भी कहा है कि मूलमन्त्र से यह पूजा की जानी चाहिए। हे सुव्रत! अगस्त्य अब बतलाइये कि मूलमन्त्र से कैसे पूजा होगी? अगस्त्य उवाच सर्वेषां राममन्त्राणां मन्त्रराजं षडक्षरम्। तारकं ब्रह्म वेदोक्तं तेन पूजा प्रशस्यते।।12।। (अगस्त्य बोले- ) सभी राम-मन्त्रों में छह अक्षरों का मन्त्रराज वेद में तारक ब्रह्म का स्वरूप कहा गया है। इससे पूजा प्रशस्त होती है। दशमाध्यायविधिना¹ पूजा कार्या प्रयत्नतः। द्वारपीठाङ्गदेवानामावृतीनां तथैव च।।13।। आदावेव प्रकुर्वीत देवस्य प्रतिमां ततः।। उपचारैः षोडशभिः पूजां कुर्याद्यथाविधि।।14।। प्रयत्नपूर्वक दशम अध्याय में उक्त विधि से षोडशोपचार से द्वार देवता, पीठ देवता, अंग देवता तथा अन्य आवरण-देवताओं की पूजा विधान से करनी चाहिए। आवाहनं स्थापनं च संनिधापनमेव च। संनिरोधनमेव स्यादवगुण्ठनमञ्जसा।।15।। तत्तन्मुद्राभिरेवं स्याद् देवं संप्रार्थ्य भक्तितः। शङ्खपूजां प्रकुर्वीत पूर्वोक्तविधिना मुने।।16।।
- ग. एवं घ. दशाक्षरविधानेन।