भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

पृष्ठ 262, कुल 337 में से

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पृष्ठ 262

सप्तविंशोऽध्यायः (201) देवता का आवाहन, स्थापन, संनिधापन, संनिरोधन अवगुंठन उन उन मुद्राओं से करें तथा भक्तिपूर्वक उनकी प्रार्थना कर शंखपूजा पूर्व में कही गयी विधि से करें। कलशं वामभागस्थं पूजाद्रव्याणि चादरात्। पात्रं च प्रोक्षयेद् भक्त्या चात्मानं मन्त्रमुच्चरन्।।17।। वाम भाग में स्थित कलश, पूजा-सामग्रियों, पात्रों एवं स्वयं का प्रोक्षण भक्तिपूर्वक मन्त्र का उच्चारण करते हुए करें। प्रतिमां शंखपूजां च कुर्याद्देवमनुस्मरन्। पात्रासादनमप्येवं कुर्याद् देवमतन्द्रितः।।18।। प्रतिमा का प्रोक्षण तथा शंख की पूजा भी इसी प्रकार श्रीराम का स्मरण करते हुए करें तथा वाम भाग में पात्रों को यथास्थान रखने का कार्य भी आलस्य छोड़कर इसी प्रकार करें। पीताम्बराणि देवाय प्रार्थितान्यर्पयेत् सुधीः। स्वर्णयज्ञोपवीतानि दद्याद् देवाय शक्तितः।।19।। नानारत्नविचित्राणि दद्यादाभरणानि च। विद्वान् यजमान पीले वस्त्रों की प्रार्थना कर देवता को अर्पित करे। स्वर्ण- निर्मित यज्ञोपवीत आदि भी देवता को समर्पित करे। नाना प्रकार के रत्नों से जड़े हुए आभूषण भी समर्पित करें। हिमाम्बुघृष्टरुचिरघनसारसमन्वितम् ।।20।। गन्धं दद्यात्प्रयत्नेन चागरुं च सकुङ्कुमम्। मूलमन्त्रेण सकलानुपाचारान्प्रकल्पयेत्।।21।। बर्फ के पानी में घिसा हुआ सुन्दर कपूर, कुंकुम तथा अगर से युक्त गन्ध समर्पित करें। सभी उपचार मूलमन्त्र से कल्पित करें। कह्लारकेतकीजातीपुन्नागाद्यैः प्रपूजयेत्। चम्पकैः शतपत्रैश्च सुगन्धैः सुमनोहरैः।।22।। सुगन्धित एवं सुन्दर कमल, केतकी, जाती, नागकेसर, चम्पा, शतपत्र के पुष्पों से पूजन करें।