अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 263, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ें(202) अगस्त्य-संहिता —————————————————————————————————————————— घण्टां च वादयन् धूपं दीपं चास्मै समर्पयेत्। भक्ष्यभोज्यादिकं भक्त्या देवाय विधिनाऽर्पयेत् ।।२३।। घण्टा बजाते हुए धूप, दीप, भक्ष्य, भोज्य आदि पदार्थ देवता को विधिपूर्वक समर्पित करें। एवं सोपस्करं देवं दत्वा पापैः प्रमुच्यते। जन्मकोटिकृतैः घोरैर्नानारूपैः सुदारुणैः ।।२४।। विमुक्तस्तत्क्षणादेव राम एव भवेन्मुने। इस प्रकार उपकरणों के साथ देवता को समर्पित कर अनेक प्रकार के दारुण, करोड़ों जन्मों में किये गये पापों से वह उसी समय मुक्त होकर श्रीराम का स्वरूप प्राप्त कर लेता है। श्रद्दधानस्य ते प्रोक्तं श्रीरामनवमीव्रतम् ।।२५।। सर्वलोकहितार्थाय पवित्रं पापनाशनम्। हे मुनि! आप श्रद्धावान् हैं, इसलिए मैंने सभी लोगों के कल्याण के लिए पवित्र और पापों का नाश करनेवाले श्रीरामनवमी व्रत के बारे में बतलाया। लौहेन निर्मितं चापि शिलया दारुणापि वा ।।२६।। येन केन प्रकारेण यस्मै कस्मै क्रमान्मुने। चैत्रशुक्लनवम्यां तु दत्वा विप्राय भक्तितः ।।२७।। सर्वपापविनिर्मुक्तो भवेदेव न संशयः। लोहा, पत्थर अथवा काष्ठ की बनी हुई प्रतिमा जिस किसी भी प्रकार से जिस किसी ब्राह्मण को विधानपूर्वक चैत्र शुक्ल नवमी तिथि को दान कर सभी पापों से मुक्त होता ही है, इसमें सन्देह नहीं। तस्मिन् दिने महापुण्ये स्नानदानादिकं मुने ।।२८।। कृतं सर्वप्रयत्नेन यत्किंचिदपि भक्तितः। महादानादितुल्यं स्याद्रामोद्देशेन कल्पितम्। वित्तशाठ्यमकृत्वैव सर्वं कुर्यात् स्वशक्तितः ।। उस महान् पुण्यमय दिन में जो कुछ भी स्नान, दान आदि भक्ति एवं यत्नपूर्वक किया जाता है, वह अक्षय्य होता है। श्रीराम के उद्देश्य से जो कुछ भी किया जाता है वह महादान आदि के समान फलदायी होता है। अपनी सम्पत्ति की अनदेखी न करते हुए अपनी शक्ति के अनुसार सबकुछ करना चाहिए। Rarest Archiver