भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

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पृष्ठ 264

अष्टाविंशोऽध्यायः (203) — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — तस्मिन् दिने महापुण्ये प्रातरारभ्य भक्तितः।।29।। जपेदेकान्त आसीनो यावत्स्याद्दशमीदिनम्। उस महापुण्यमय दिन में प्रातःकाल से आरम्भ कर एकान्त में बैठकर जबतक दशमी तिथि रहे, तबतक जप करें। तेनैव स्यात् पुरश्चर्या दशम्यां भोजयेद् द्विजान्।।30।। भक्ष्यभोज्यैर्बहुविधैर्दद्याच्छक्त्या च दक्षिणाम्। कृतकृत्यो भवेत्तेन सद्यो रामः प्रसीदति।।31।। उसी मन्त्र से पुरश्चरण किया जाना चाहिए, दशमी में अनेक प्रकार के भक्ष्य-भोज्य पदार्थों से ब्राह्मण-भोजन करना चाहिए और शक्ति के अनुसार दक्षिणा दी जानी चाहिए। इससे वह व्यक्ति कृतकृत्य हो जाता है; उसपर श्रीराम तुरत प्रसन्न होते हैं। तद्दिने तु नरो याति पुनरावृत्तिवर्जितः। द्वादशाब्दशतेनापि यत्पापं नापमृज्यते।।32।। विलयं याति तत्सर्वं श्रीरामनवमीदिने। जपेन राममन्त्राणां योऽयं जानाति तस्य तु।।33।। रामनवमी के दिन यह सब करने से मनुष्य पुनर्जन्म से रहित मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं। बारह वर्षों में भी जो पाप नहीं कटता, वे सारे पाप श्रीरामनवमी के दिन श्रीराम के मन्त्र के जप से नष्ट होते हैं, साथ ही, जो इसे जानते हैं, उनके भी पाप नष्ट हो जाते हैं। उपोष्य च स्मरन् रामं न्यासपूर्वमनन्यधीः। गुरोर्लब्धमनुर्यस्तु तस्य न्यासपुरस्सरम्।।34।। यामे यामे च विधिवद्रामपूजां समाहितः।¹ उपवास कर श्रीराम का स्मरण करते हुए एकाग्रचित्त हो गुरु से प्राप्त मन्त्र का न्यासपूर्वक जप करना चाहिए तथा पहर-पहर पर ध्यान लगाकर विधिवत् श्रीराम की पूजा करनी चाहिए। मुमुक्षवोऽपि च सदा श्रीरामनवमीव्रतम्।।35।। ¹न त्यजन्ति सुरश्रेष्ठो देवेन्द्रोऽपि विशेषतः। हमेशा मोक्ष की कामना करनेवाले भी श्रीरामनवमी का व्रत नहीं छोड़ते हैं। विशेष रूप से देवताओं में श्रेष्ठ देवराज इन्द्र भी रामनवमी व्रत नहीं छोड़ते हैं।

  1. ग. यामेन विधिवत् सर्वं कुर्यात् पूजां समाहितः।