अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें(204) अगस्त्य-संहिता
तस्मात्सर्वात्मना सर्वे कृत्वैव नवमीव्रतम्। मुच्यते सर्वपापेभ्यो यान्ति ब्रह्म सनातनम्।।36।। अतः सबलोग सभी प्रकार से नवमी व्रत करके ही सभी पापों से मुक्त हो जाते हैं और सनातन ब्रह्म को प्राप्त करते हैं। इत्यगस्त्यसंहितायां परमरहस्ये रामनवमीव्रतविधानं नाम सप्तविंशोऽध्यायः। अष्टाविंशोऽध्यायः अगस्त्य उवाच चैत्रमासे नवम्यां तु जातो रामः स्वयं हरिः। पुनर्वस्वृक्षसहिता सा तिथिः सर्वकामदा।।1।। श्रीरामनवमी प्रोक्ता कोटिसूर्यग्रहाधिका। चैत्रशुद्धे तु नवमी पुनर्वसुयुता यदि।।2।। चैत्र मास की नवमी तिथि को स्वयं विष्णु श्रीराम के रूप में उत्पन्न हुए। पुनर्वसु नक्षत्र के साथ वह तिथि सभी कामनाएँ पूर्ण करती है। यह श्रीरामनवमी कही गयी है, जो करोड़ों सूर्यग्रहण के से अधिक पुण्यदायिनी है, यदि चैत्र मास के शुक्लपक्ष की नवमी तिथि में पुनर्वसु नक्षत्र का योग रहे। पुनर्वस्वृक्षसंयोगः स्वल्पोऽपि यदि दृश्यते। चैत्रशुद्धनवम्यां तु सा तिथिः सर्वकामदा।।3।। पुनर्वसु नक्षत्र का संयोग यदि थोड़ा भी दिखायी दे, तो चैत्र शुक्ल नवमी की वह तिथि सभी कामनाएँ पूर्ण करती है। अस्मिन् दिने महापुण्ये राममुद्दिश्य भक्तितः। यत्किञ्चित् क्रियते कर्म तद्भवक्षयकारकम्।।4।। उस महापुण्यमय दिन में श्रीराम को लक्ष्य कर भक्ति से जो कुछ भी कर्म किये जाते हैं, वे पुनर्जन्म का नाश करते हैं। उपोषणं जागरणं पितॄनुद्दिश्य तर्पणम्। तस्मिन् दिने तु कर्त्तव्यं ब्रह्मप्राप्तिमभीप्सुभिः।।5।।
- ग. यहाँ से चार चरण अनुपलब्ध।