अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 266, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टाविंशोऽध्यायः (205) उपवास, जागरण पितर को लक्ष्य कर तर्पण उस दिन सनातन ब्रह्म की प्राप्ति के लिए करना चाहिए। राम एव परं ब्रह्म तद्दिने रामतोषकम्। उपोषणं जागरणं तस्मात्कुर्याद् विशेषतः¹॥६॥ यस्तु रामनवम्यां तु भुङ्क्ते मोहाद् विमूढधीः। कुम्भीपाकेषु घोरेषु पच्यते नात्र संशयः॥७॥ यस्तु रामनवम्यांतु नियतस्तर्पयेत् पितॄन्। ते सर्वे तत्क्षणादेव यान्ति विष्णोः परं पदम्॥८॥ श्रीराम परब्रह्म श्रीराम को प्रसन्न करनेवाले उपवास और जागरण आदि करना चाहिए। जो मूर्ख मोहवश रामनवमी के दिन भोजन करते हैं, वह घोर कुम्भीपाक आदि नरकों में दग्ध होते हैं, इसमें सन्देह नहीं। जो रामनवमी के दिन नियमपूर्वक पितरों का तर्पण करते हैं, वे उस समय से विष्णु के परम पद को प्राप्त करते हैं। यस्तु रामनवम्यां तु दद्याद् वित्तानुसारतः। यत्किंचिदपि तत्सर्वं महादानसमं भवेत्॥९॥ जो रामनवमी के दिन अपने विभव के अनुसार जो कुछ भी दान करते हैं, उन्हें महादान के समान फल मिलता है। यस्तु रामनवम्यां तु कुर्याद्रामव्रतं यदि। तुलापुरुषदानादि फलं प्राप्नोति मानवः॥१०॥ जो रामनवमी में श्रीराम का व्रत करता है, वह मनुष्य तुलापुरुष आदि दान का फल पाता है। सूर्यग्रहे कुरुक्षेत्रे महादानैः कृतैर्मुहुः। यत्फलं तदवाप्नोति श्रीरामनवमीव्रतात्॥११॥ कुरुक्षेत्र में सूर्यग्रहण के समय बार बार महादान करने का फल श्रीरामनवमी व्रत करने से मनुष्य प्राप्त करता है। कुर्याद्रामनवम्यां तु उपोषणमतन्द्रितः। मातुर्गर्भमवाप्नोति नैव रामो भवेत्स्वयम्॥१२॥
- ग. तस्मात् कुर्यात् प्रयत्नतः।