अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषड्विंशोऽध्यायः (195)
दिव्यां रामकथामुक्त्वा रामभक्तैः समन्वितः। नृत्योत्सवादिभिश्चैव रामस्तोत्रैरनेकधा ।।46।। यामाष्टकं यथान्यायं गन्धपुष्पाक्षतादिभिः। सकर्पूरागरुश्चैव कह्लाराद्यैरनेकधा ।।47।। पूजयेद् विधिवद् भक्त्या दिवारात्रं नयेद् बुधः। रात्रि में श्रीराम के भक्तों के साथ श्रीराम की दिव्यकथा कहकर, नृत्य, उत्सव आदि तथा अनेक प्रकार के श्रीराम-स्तोत्रों से आठो पहर विधान के साथ चन्दन, फूल, अक्षत आदि सामग्रियों से कपूर, अगर, और कमल आदि फूलों से अनेक प्रकार से पूजन करें। इस प्रकार श्रीराम की विधिवत् भक्तिपूर्वक पूजा करते हुए दिन-रात व्यतीत करें। [ यहाँ पाण्डुलिपि क. में चन्दन के निर्माण की विधि एवं प्रभेद मूल पाठ के साथ उपलब्ध है। यह अंश ग. एवं घ. में नहीं होने के कारण इसे टिप्पणी के रूप में रखा गया है- (सकर्पूरागरुश्चैव) कस्तूरीचन्दनन्तथा ।।47।। कङ्कोलञ्च भवेदेभिः पञ्चभिर्यक्षकद्दमः। कस्तूरिकायाः द्वौ भागौ चत्वारश्चन्दनस्य च। कुङ्कुमस्य त्रयश्चैव शशिनः स्याच्चतुस्समम् ।।48।। कुङ्कुमं केशरञ्चैव शशिकर्पूर एव च। कर्पूरचन्दनं दर्प कुङ्कुमं च समांशकम् ।।49।। सर्वगन्धमितिप्रोक्तं समस्तैश्च सुवल्लभम्। कपूर, अगरु, कस्तूरी, चन्दन और कंकोल इन्हें मिलाकर यक्षकदम बनाया जाता है। दो भाग कस्तूरी, चार भाग चन्दन, तीन भाग रोली और चार भाग श्वेतकर्पूर मिलाकर 'चतुस्सम' नामक सुगन्धित द्रव्य होता है। अथवा कुंकुम, केसर, श्वेतकर्पूर, ये तीनों मिश्रित करें। अथवा कर्पूर, चन्दन, कस्तूरी और रोली समान मात्रा में मिलायें, इसे 'सर्वगन्ध' कहते हैं।] ततः प्रातः समुत्थाय स्नान-सन्ध्यादिकाः क्रियाः ।।48।। समाप्य विधिवद्रामं पूजयेत् पूर्ववन्मुने। तब प्रातःकाल उठकर स्नान, सन्ध्या आदि सभी कृत्य समाप्त कर विधिवत् पूर्वोक्त रीति से श्रीराम की पूजा करें।