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अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

पृष्ठ 255, कुल 337 में से

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पृष्ठ 255

(194) अगस्त्य-संहिता अस्यां रामनवम्यां च रामाराधनतत्परः। उपोष्याष्टसु यामेषु पूजयित्वा यथाविधि।।39।। इमां स्वर्णमयीं रामप्रतिमां सुप्रयत्नतः। श्रीरामप्रीतये दास्ये रामभक्ताय धीमते।।40।। प्रीतो रामो हरत्वाशु पापानि सुबहूनि मे। अनेकजन्मसंसिद्धान्यभ्यस्तानि महान्ति च।।41।। इस घर में गाते-बजाते लोगों के साथ प्रवेश कर प्रसन्नचित्त विद्वानों द्वारा पुण्याहवाचन करावें। इसके बाद भगवान् श्रीराम का स्मरण करते हुए इस प्रकार संकल्प करें:- 'इस रामनवमी में मैं श्रीराम की आराधना करता हुआ आठो पहर उपवास कर विधिपूर्वक श्रीराम की पूजा कर श्रीराम की इस स्वर्णमयी प्रतिमा को प्रयत्नपूर्वक श्रीराम की प्रीति के लिए श्रीराम के भक्त को दान करता हूँ। इससे प्रसन्न श्रीराम मेरे अनेक महान् पापों को हर लें, जो मेरे द्वारा अनेक जन्मों में बार बार किए गये हैं।' ततः स्वर्णमयीं रामप्रतिमां पलमानतः। निर्मितां द्विभुजां दिव्यां वामाङ्कस्थितजानकीम्।।42।। विभ्रतीं दक्षिणकरे ज्ञानमुद्रां महामते। वामेनाधः करेणाराद् देवीमालिङ्ग्य संस्थिताम्।।43।। सिंहासने राजतेऽत्र पलद्वयविनिर्मिते। पञ्चामृतस्नानपूर्वं सम्पूज्य विधिवन्नरः।।44।। मूलमन्त्रेण नियतो न्यासपूर्वमतन्द्रितः। दिवैव विधिवत्कृत्वा रात्रौ जागरणन्ततः।।45।। इसके बाद एक पल सोना से निर्मित श्रीराम की प्रतिमा लें, जिसमें दो भुजाएँ हों, वाम भाग में जानकीजी हों, दक्षिण हाथ ज्ञान मुद्रा में हों और वायें हाथ से देवी का आलिंगन दूर से किए हो। ऐसी प्रतिमा को दो पल सोना से निर्मित सिंहासन पर विराजित करें पञ्चामृत से स्नान कराकर पूर्व में न्यास कर मूलमन्त्र से नियमपूर्वक विना आलस्य किए हुए प्रतिमा-पूजन करें। दिन में इस प्रकार विधानपूर्वक कृत्य सम्पन्न कर रात्रि में जागरण करें।

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