अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 254, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ेंषड्विंशोऽध्यायः (193) — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — एकभुक्त व्रत करते हुए सदाचारपूर्वक जितेन्द्रिय होकर एकान्त में रहते हुए श्रीराम के प्रति मन समर्पित कर श्रीराम की दिव्य कथा सुनते हुए दिन का शेष भाग व्यतीत करें। सायं सन्ध्यादिकाः कुर्यात् सदाराममनुस्मरन् ।।30।। आचार्य सहितो रात्रावधःशायी जितेन्द्रियः। सायंकाल श्रीराम का स्मरण करते हुए सन्ध्यावंदन आदि कृत्य करें तथा रात्रि में आचार्य के साथ भूमि पर जितेन्द्रिय होकर शयन करें। ततः प्रातः समुत्थाय स्नात्वा सन्ध्यां विधाय च ।।31।। प्रातः सर्वाणि कर्माणि शीघ्रमेव समर्पयेत्। इसके बाद प्रातःकाल उठकर स्नान और सन्ध्यावंदन कर सभी कर्मों को शीघ्र सम्पन्न करें। चतुर्द्वारं पताकाढ्यं सुवितानं सुतोरणम् ।।32।। मनोरमं महोत्सेधं पुष्पाद्यैः समलङ्कृतम् ।। शङ्खचक्रहनूमद्भिः प्राग्द्वारे समलङ्कृतम्। गरुत्मच्छार्ङ्गबाणैश्च दक्षिणे समलङ्कृतम् ।।35।। गदापद्माङ्गदैश्चैव पश्चिमे समलङ्कृतम्। पद्मस्वस्तिकनीलैश्च कौबेरे समलङ्कृतम् ।।36।। मध्ये हस्तचतुष्काढ्ये वेदिकायुक्तमायतम्। प्रविश्य गीतवृत्तैश्च वाद्यैश्चापि हि संयुतम् ।।37।। तब ऐसे विशाल गृह में प्रवेश करें, जहाँ चार हाथ की वेदी बनी हुई हो, चारो ओर द्वार हों, पताकाएँ फहरा रही हों, चन्दोवा टँगे हों, वंदनबार लगे हों, सुन्दर, विशाल और फूल आदि से सजे हों। इस भवन का पूर्व द्वार शंख, चक्र एवं हनुमान् से अलंकृत हों, दक्षिण द्वार पर गरुड, शार्ङ्ग एवं बाण, पश्चिम द्वार पर गदा, पद्म एवं अंगद हों तथा पद्म, स्वस्तिक एवं नील उत्तरी द्वार पर हों। बीच में चार हाथ लम्बाई और चौड़ाई की वेदी बनी हुई है। पुण्याहं वाचयित्वात्र विद्वद्भिः प्रीतमानसैः। ततः संकल्पयेद् देवं राममेव स्मरन् मुने ।।38।।