भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

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पृष्ठ 253

(192) अगस्त्य-संहिता

दान्तं कुटुम्बिनं विप्रं वेदशास्त्ररतं सदा।।२३।। श्रीरामपूजानिरतं सुशील दम्भवर्जितम्। विधिज्ञं राममन्त्राणां राममन्त्रैकसाधकम्।।२४।। आहूय भक्त्या सम्पूज्य वृणुयात् श्रद्धयान्वितः। श्रीरामप्रतिमादानं करिष्येऽहं द्विजोत्तम। तत्राचार्यो भव प्रीतः श्रीरामोऽपि त्वमेव मे।।२५।। तब उदार विचार वाले, परिवार वाले और जो वेद और शास्त्र में रमे रहते हों, श्रीराम की पूजा करते हों, सुशील, अहंकार रहित हों, श्रीराम के मन्त्रों की विधानों का ज्ञान रखते हों तथा श्रीराम के मन्त्र को सिद्ध किए हों, ऐसे ब्राह्मण को भक्तिपूर्वक आमन्त्रित कर श्रद्धा के साथ उनका वरण करें- 'हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! मैं श्रीराम की प्रतिमा का दान करूँगा। इस अनुष्ठान में आप आचार्य हों तथा मेरे ऊपर प्रसन्न हों। मेरे लिए श्रीराम भी आप ही हैं।' इत्युक्त्वापूज्य तं विप्रं स्नापयित्वा ततः स्वयम्। तैलेनाभ्यङ्गमास्नायात् चिन्तयन् राघवं हृदि।।२६।। ऐसा कहकर उस विप्र की पूजा कर उन्हें स्नान कराकर फिर हृदय में श्रीराम का ध्यान करते हुए तेल लगाकर स्वयं स्नान करें। श्वेताम्बरधरः श्वेतगन्धमाल्यानि धारयेत्। अर्चितो भूषितश्चैव कृतमाध्याह्निकक्रियः।।२७।। आचार्य भोजयेत् पश्चात् सात्त्विकान्नः सुविस्तरैः। भुञ्जीत स्वयमप्येवं हृदि राममनुस्मरन्।।२८।। श्वेत वस्त्र पहनकर श्वेत एवं सुगन्धित माला धारण करें। अर्चित और भूषित होकर मध्याह्नकालिक कृत्यों को सम्पन्न कर अनेक प्रकार के सात्त्विक भोज्य पदार्थों से आचार्य को भोजन कराकर स्वयं भी हृदय में श्रीराम का स्मरण करते हुए भोजन करें। एकभुक्तव्रती तत्र सदाचारो जितेन्द्रियः। वसेत् स्वयं तथैकान्ते श्रीरामार्पितमानसः।।२९।। शृण्वन् रामकथां दिव्यामहःशेषं नयेन्मुने।

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