अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 252, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ेंषड्विंशोऽध्यायः (191) — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — एकामपि नरो भक्त्या श्रीरामनवमीं मुने।¹ उपोष्य कृतकृत्यः स्यात्² सर्वपापैः प्रमुच्यते।।17।। हे मुनि सुतीक्ष्ण! जो नर एक बार भी भक्तिपूर्वक श्रीरामनवमी व्रत कर लेते हैं, वे कृतकृत्य हो जाते हैं और सभी पापों से मुक्त हो जाते हैं। नरो रामनवम्यान्तु श्रीरामप्रतिमाप्रदः। विधानेन मुनिश्रेष्ठ सुमुक्तो नात्र संशयः।।18।। रामनवमी में श्रीराम की मूर्ति का दान विधिपूर्वक करनेवाले भलीभाँति मुक्त हो जाते हैं; इसमें सन्देह नहीं। सुतीक्ष्ण उवाच श्रीराम प्रतिमादानं विधानं च कथं मुने। कथयस्व प्रसादेन मयि भक्तस्य विस्तरात्।।19।। सुतीक्ष्ण ने पूछा- हे मुनि अगस्त्य! श्रीराम की प्रतिमा दान करने का क्या विधान है? मुझपर प्रसन्न होकर भक्तों की सुविधा के लिए विस्तार से कहें। अगस्त्य उवाच कथयिष्यामि ते ब्रह्मन् प्रतिमादानमुत्तमम्। विधानं चापि यत्नेन यतस्त्वं वैष्णवोत्तमः।।20।। अगस्त्य बोले- हे ब्राह्मण सुतीक्ष्ण! तुम विष्णु के श्रेष्ठ भक्त हो, अतः मैं प्रतिमा-दान की विधि यत्नपूर्वक कहूँगा। अष्टम्यां चैत्रमासस्य शुक्लपक्षे जितेन्द्रियः। दन्तधावनपूर्वन्तु प्रातः स्नायाद्यथाविधि।।21।। चैत्र मास के शुक्लपक्ष की अष्टमी तिथि को जितेन्द्रिय होकर पहले दातून कर प्रातःकाल विधानपूर्वक स्नान करें। नद्यां तडागे कूपे वा ह्रदे प्रस्रवणेऽपि वा। ततः सन्ध्यादिकं कुर्यात् संस्मरन् राघवं हृदि।।22।। गृहमागत्य विप्रेन्द्र कुर्यादौपासनादिकम्। नदी, तालाब, कुआँ, झील या जलप्रपात में स्नान करें। तब हृदय में श्रीराम का ध्यान करते हुए सन्ध्यावंदन आदि करें। इसके बाद घर आकर दैनिक उपासना करें। ━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━
- ग. श्रीरामनवमीव्रतात्। 2. ग. भक्त्या यः कुर्यात् ।