अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 245, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ें(184) अगस्त्य-संहिता प्राणायामस्तु गायत्र्या सर्वेषामपि सत्तम। ¹जलाभिमन्त्रणं वापि मूलमन्त्रेण मार्जनम्।।16।। जलस्य प्राशनं वापि ज्ञेयं चार्घ्यस्य वै मुने। सीतामन्त्रेण कुर्वीत मूलमन्त्रजपं तथा।।17।। उपस्थानादिकाः कार्यास्तत्रैव गतकल्मषैः। सबके लिए गायत्री से प्राणायाम विहित है। जलाभिमन्त्रण, मार्जन, जलप्राशन, अर्घ्यप्रदान ये कर्म मूलमन्त्र (दीक्षामन्त्र) से करें। मूलमन्त्र का जप कर और सीतामन्त्र (श्रीं सीतायैः नमः) से उपस्थान आदि क्रियाएँ निष्पाप साधकों को करना चाहिए। सूर्यमण्डलमध्यस्थं रामं सीतासमन्वितम्।।18।। नमामि पुण्डरीकाक्षमाञ्जनेयगुरुं परम्। नमः श्रीरामदेवाय ज्योतिषां पतये नमः।।19।। साक्षिणे सर्वभूतानां परमानन्दरूपिणे। रघुनाथाय दिव्याय महाकारुणिकाय च।।20।। नमोऽस्तु कौशिकानन्द दायिने ब्रह्मरूपिणे।¹ सूर्यमण्डल के मध्य में अवस्थित सीतासहित कमलनयन श्रीराम को प्रणाम है, जो हनुमान् के परम गुरु हैं। ज्योतिःस्वरूप ग्रहों और नक्षत्रों के स्वामी देवता श्रीराम को प्रणाम है। जो सभी प्राणियों के साक्षी महान् करुणामय दिव्य श्रीरघुनाथ परमानन्द स्वरूप हैं, उन्हें प्रणाम। विश्वामित्र को आनन्दित करनेवाले ब्रह्मस्वरूप श्रीराम को प्रणाम। दीपस्थानञ्च कर्त्तव्यं रामं ध्यायेदनन्यधीः।।21।। त्रिकालमेवं यः कुर्याद् राम एव भवेत् स्वयम्। पुरश्चर्या तु सर्वेषामुक्तमार्गेण वेष्यते।।22।। (इस प्रकार उपस्थापन कर) श्रीराम का ध्यान करते हुए दीप स्थापित करें। इस प्रकार जो तीनों सन्ध्या करते हैं, वे स्वयं राम ही हो जाते हैं। सभी मन्त्रों का पुरश्चरण उक्त मार्ग से भी अनुशंसित है। एवं सिद्धमनुं मन्त्री प्रत्यहं नियतव्रतः। ²षट्सहस्रं सहस्रं च त्रिशतं शतमेव च।।23।। जपं कुर्यात् प्रयत्नेन नो चेत् प्राप्नोत्यधो गतिम्।
- ग. में दो चरण नहीं हैं । 1.घ.दो पंक्तियाँ अनुपलब्ध।