अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 244, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चविंशोऽध्यायः (183)
विनैव न्यासविधिना जपमात्रेण सिद्धिदाः। सामान्येन तु सर्वेषां मनूनां राघवस्य तु।।10।। अनुष्ठानविधिर्ज्ञेयो विशेषास्तत्र तत्र वै। वक्ष्यते ते महाभाग यथामति सुविस्तरम्।।11।। हे ब्राह्मण श्रेष्ठ सुतीक्ष्ण! शीघ्रमुक्ति देनेवाले जो श्रीराम के मन्त्र हैं, उसके विषय में सुनो। गुरु से दीक्षा, पंचांग पुरश्चरण और न्यास-विधानों के विना ही केवल जप करने से सिद्धि देने वाले ये मन्त्र हैं। श्रीराम के सभी मन्त्रों की सामान्य अनुष्ठान विधि जाननी चाहिए। मन्त्रों के सन्दर्भ में जो विशेष विधियाँ हैं, उसे अपनी बुद्धि के अनुसार यहाँ मैं विस्तार से कहता हूँ। षडक्षरविधानं तु सर्वेषां प्रकृतिं विदुः। भूतशुद्धिर्विधातव्या सर्वेषामादितो मुने।।12।। न्यासाः पूर्वोदिताः सर्वे कार्या यत्नेन सुव्रत। षडक्षर मन्त्र का जो विधान है, वही सभी मन्त्रों का स्वाभाविक विधान है। सभी मन्त्रों के अनुष्ठान के आरम्भ में भूतशुद्धि करनी चाहिए। पूर्व में कहे गये सभी न्यास यत्नपूर्वक करें। ¹अनुष्ठानेषु सर्वेषामधिकारोऽस्ति देहिनाम्।।13।। आश्रमस्थाश्च सर्वेऽपि मन्त्राणामधिकारिणः। ममुक्षुभिर्विरक्तैश्च सदा सेव्यो रघूत्तमः।।14।। यतीनां जितचित्तानामुपास्यः प्रणवो यथा। इन अनुष्ठानों में सभी मनुष्यों का अधिकार है। सभी मनुष्यों में जो किसी आश्रम में है वे मन्त्र के अधिकारी हैं। मोक्ष चाहनेवाले और संसार से विरक्त जो हैं वे श्रीराम का भजन करें। जैसे इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर लेनेवाले जो यति हैं वे प्रणव (ॐकार) की उपासना करते हैं। दीक्षाविधिस्तु कर्तव्यो विधेयो देशिकोत्तमैः।।15।। सन्ध्यां दीक्ष्यान्वितः कुर्यात् तत्तन्मन्त्रानुसारतः। दीक्षा की विधि जो पूर्व में कही गयी है वही गुरु को अपनानी चाहिए। शिष्य दीक्षा लेने के बाद से अपने अपने समय के अनुसार सन्ध्यावंदन करें।
- घ. यहाँ चार पंक्तियाँ अनुपलब्ध।