अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 243, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ें: (182) अगस्त्य-संहिता : -------------------------------------------------- : षडक्षरविधानं तु विधानान्तरमस्ति वा ।। ३ ।। : सर्वमेव समाचक्ष्व भक्तस्य त्वयि सुव्रत ।। ४ ।। : सुतीक्ष्ण बोले- हे महामुनि अगस्त्य ! आप सभी आगमों के तत्त्वों को : जानते हैं, ब्रह्म में लीन हैं, तपस्वी हैं, श्रीराम के रूप में जो स्वयं परमात्मा हैं, : उनके विषय में आपने भलीभाँति मुझे समझा दिया है। मैंने षडक्षर मन्त्र भी : भलीभाँति जान लिया है। अब यह बतलाएँ कि श्रीराम के अन्य मन्त्रों का किस : प्रकार अनुष्ठान किया जाता है। क्या केवल षडक्षर विधान ही है या दूसरा भी : कोई विधान है? हे सुव्रत अगस्त्य! मैं आपका भक्त हूँ, इसलिए मुझे सबकुछ कहें। : अगस्त्य उवाच : सुतीक्ष्ण शृणु वक्ष्यामि श्रद्दधानांपते पुनः। : वक्तव्यं तव यत्नेन यतस्त्वं वैष्णवोत्तमः ।। ५ ।। : अगस्त्य बोले- हे श्रद्धालुओ में श्रेष्ठ सुतीक्ष्ण! फिर से सुनो। तुम वैष्णवों : में श्रेष्ठ हो, इसलिए मुझे सारे विधान बतला देने चाहिए। : ये शृण्वन्ति कथां विष्णोर्वन्दन्ति चरितं हरेः। : मुक्तकण्ठञ्च गायन्ति हरिं नृत्यन्ति सुन्दरम् ।। ६ ।। : आनन्दाश्रुपरीतात्मा गात्रेषु पुलकाञ्चिताः। : आनन्दनिर्भराश्चैव स्खलन्तश्च¹ पदे पदे। : उच्चैः श्रीराम रामेति वदन्ति च हसन्ति च ।। ७ ।। : एवमादिगुणैर्युक्ताः जनाः² रामसमा हि ते। : ³वैष्णवा मनवाः सर्वे मुक्तिदाः स्युः क्रमेण हि ।। ८ ।। : जो श्रीविष्णु की कथा सुनते हैं, हरि के चरित की वन्दना करते हैं, हरि की : लीलाओं को स्मरण करते हुए मुक्तकण्ठ होकर इसका गान करते हैं। आनन्द के : आँसू से भरे हुए चित्त वाले, पुलकित होकर आनन्दमग्न होकर पग-पग पर : लड़खड़ाती बोली में जोर जोर से 'श्रीराम राम' बोलते हैं, हँसते हैं- इस प्रकार के : गुणों से युक्त होकर जो मानव विष्णु के उपासक हैं, वे श्रीराम के समान हो : जाते हैं। भगवान् विष्णु के सभी मन्त्र मुक्ति देनेवाले हैं, उन्हें क्रम से सुनो। : राममन्त्रास्तु विप्रेन्द्र शीघ्रमुक्तिप्रदाः शृणु। : विनैव दीक्षां विप्रेन्द्र पुरश्चर्यां विनैव हि ।। ९ ।। : -------------------------------------------------- : 1. ग. स्तुवन्तश्च, घ. प्लवन्तश्च। 2. ग. मान्याः । 3. घ. यहाँ से छह पंक्तियाँ : अनुपलब्ध।