अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 242, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चविंशोऽध्यायः (181) प्रयाग आदि तीर्थों में प्रायश्चित्त आदि करने से भी जो पाप नष्ट नहीं होते हैं, उन्हें भी यह मन्त्र शीघ्र नष्ट कर देता है। पुण्यक्षेत्रेषु सर्वेषु कुरुक्षेत्रादिषु स्वयं ।।47।। बुद्धिपूर्वमघं कुर्यात् तदप्याशु विनाशयेत्। कुरुक्षेत्र आदि सभी पुण्यतीर्थों में स्वयं जान बूझकर जो पाप किया जाये, उसे भी शीघ्र विनष्ट कर देता है। आत्मतुल्यसुवर्णादिदानैर्बहुविधैरपि ।।48।। किञ्चिदप्यपरिक्षीणं पापं तदपि नाशयेत्। अपने भार के बराबर सुवर्ण का दान आदि अनेक प्रकार के दानों से जो पाप नष्ट नहीं होता, उसे भी यह मन्त्र नष्ट कर देता है। यद्वातिसञ्चितं पापं मूलबद्धमघञ्च यत् ।।49।। तन्मन्त्रस्मरणादेव निःशेषं तत्प्रणश्यति ।।50।। अथवा अधिक मात्रा में संचित जो पाप है और जो पाप अपनी जड़ें जमा चुका है, मद्यपान आदि से जो पाप होता है, वे सारे पाप इस मन्त्र के स्मरण मात्र से अशेष रूप में नष्ट हो जाते हैं। इत्यगस्त्यसंहितायां परमरहस्ये मन्त्रमहिमाख्यानं नाम चतुर्विंशोऽध्यायः ।।24।। अथ पञ्चविंशोऽध्यायः सुतीक्ष्ण उवाच सर्वागमैकतत्त्वज्ञ¹ ब्रह्मनिष्ठ तपोधन। रामात्मनस्त्वया तत्त्वं ब्रह्मणः परमव्ययम् ।।1।। प्रदर्शितं सम्यगेव सुविस्तरमनेकधा। षडक्षरविधानं तु² सम्यक् ज्ञातं मया प्रभो ।।2।। अन्येषां राममन्त्राणामनुष्ठानं कथं मुने।
- ग. सर्वेषामेव तत्त्वञ्च। 2. ग. वा ।