अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 241, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ें(180) अगस्त्य-संहिता गत्वा तु मातरं मोहादगम्यायाश्च योषितः।।40।। उपास्यानेन मन्त्रेण समं तदपि नाशयेत्।। मोहवश मातृतुल्य नारी तथा अगम्या से मैथुन करने का पापी इस मन्त्र की उपासना कर उस पाप को नष्ट कर लेते हैं। महापातकपापिष्ठसंगत्या सञ्चितञ्च यत्।।41।। नाशयेत् तत् कथालापशयनासनभोजनैः। महापातकी और अन्य पापियों की संगति करने से जो पाप संचित होता है, वे श्रीराम की कथा की चर्चा, श्रीराम के मन्दिर में शयन, उपवेशन (बैठने) और प्रसाद खाने से नष्ट हो जाते हैं। पितृमातृवधोत्पन्नं बुद्धिपूर्वक मव्यम्।।42।। निःशेषं नाशयेत्येव कालत्रयसमुद्भवम्। भ्रातृमित्रसुहृद्यानां यद्वा विश्वासघातिनाम्।।43।। यद् वा बालवधोत्पन्नं विषशस्त्रास्त्रमायिकम्। गुरुपुत्रकलत्रादिवधोत्पन्नं दुरात्मनाम्।।44।। तदनुष्ठानमात्रेण सर्व एव¹ विलीयते। माता-पिता के वध से उत्पन्न, जान-बूझकर किये गये तथा तीनों कालों में उत्पन्न पाप को यह मन्त्र नष्ट करता है। भाई, मित्र और अन्य प्रिय लोगों के साथ विश्वासघात का पाप, बाल-हत्या तथा विष देकर, शस्त्र-अस्त्र से अथवा जादू-टोना से की गयी हत्या का पाप अथवा गुरु, पुत्र, स्त्री आदि की हत्या का पाप जो दुरात्माओं को होता है, वह पाप श्रीराम के मन्त्र का अनुष्ठान मात्र करने से नष्ट हो जाता है। तत् सद्गुरूपदिष्टेन वर्तनानुष्ठितं पुनः।।45।। रामात्मा मन्त्र एवायं पापराशिनिरासकृत्। इसलिए सद्गुरु के उपदेश से मण्डल में अनुष्ठान किया गया यह श्रीराम स्वरूप मन्त्र पापराशि को निरस्त करनेवाला है। यत्रयागादितीर्थोत्थप्रायश्चित्तादिकैरपि ।।46।। नैवापयुज्यते पापं तदप्याशु विनाशयेत्।
- ग. एप। Rarest Archiver