अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 240, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुर्विंशोऽध्यायः (179) तब निरन्तर जप, होम, पूजा आदि कर्म करें। इससे जो कुछ भी होगा, वह अनन्त फलदायक हो जायेगा, यह सत्य है, इसमें सन्देह नहीं। तदेतद्वाचको मन्त्रः सर्वस्यार्थस्य साधकः। सदसद्वाचकश्चायं मन्त्रो विजयते परः।।34।। मन्त्र सार्थक हो या अनर्थक, सभी प्रयोजनों के साधक हो जाते हैं। सार्थक या अनर्थक परम मन्त्र की जीत होती है। रामात्मनो मनोः सद्यः स्मरणात् कीर्तनादपि। ब्राह्मणं क्षत्रियं वैश्यं शूद्रं कृत्याप्यकल्मषम्।।35।। श्रीराम के स्वरूप मन्त्र स्मरण करने और कीर्तन करने से ब्राह्मण, क्षत्रिय वैश्य और शूद्र को शीघ्र निष्पाप बनाते हैं। संचिनोति नरो मोहाद्यद्यत्तदपि नाशयेत्। ग्राम्यारण्यपशुघ्नत्वं संचितं दुरितं च यत्।।36।। निःशेषं नाशयत्येव रामात्मा द्वयक्षरो मनुः। मनुष्य मोहवश जो जो पाप संचित करते हैं, उन्हें भी ये मन्त्र शीघ्र नाश कर देते हैं। गाँव या जंगल में रहनेवाले पशु की हत्या का जो संचित पाप है, उसे श्रीराम स्वरूप दो अक्षरों वाला 'राम' मन्त्र पूर्णतः नष्ट कर देता है। ^1तन्मृष्यवाक्य कोपादिभावोद्भावकृतार्चिनः।।37।। मद्यपानेन^2 यत्पापं तदप्याशु विनाशयेत्। अभक्ष्यभक्षणात्^3 पापं मिथ्याज्ञानसमुद्भवम्।।38।। सर्वं विलीयते राममन्त्रस्यास्यैव कीर्तनात्। मिथ्या भाषण, क्रोध आदि के कारण उत्पन्न पाप, उद्भाव (उपेक्षा), आग लगाने आदि का पाप तथा मद्यपान से जो पाप होता है उसे शीघ्र यह विनष्ट करता है। अभक्ष्य वस्तुओं के खाने से जो तथा मिथ्या ज्ञान के कारण उत्पन्न पाप श्रीराम के इसी मन्त्र के जप से विलीन हो जाते हैं। श्रोत्रियस्वर्णहरणाद्यच्च पापमुपार्जितम्।।39।। रत्नादेरपहारेण तदप्याशु विनाशयेत्।। वैदिकों का सोना चुराने या छीनने से, रत्न आदि छीनने से जो पाप संचित होता है, उसे भी यह मन्त्र यह शीघ्र नाश कर देता है।
- घ. में अनुपलब्ध। 2. ग. मधुपानेन । 3. ग. अभक्षणाय। Rarest Archiver