अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 231, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ें(170) अगस्त्य-संहिता —————————————————————— तत्रैव सुदृढं बद्ध्वा पवनं सात्मना समम्। स्थित्वैवं तु मुहूर्ताद्धेर्मुन्मीलय मुखं मुने।।२८।। शरीर के अन्दर में स्थित वायु को दश प्रकार से प्रयत्नपूर्वक कुम्भक द्वारा एकीकृत कर वहीं पर दृढ़ रूप से वायु को आत्मा के साथ बाँधकर इस तरह आधा मुहूर्त (24 मिनट) स्थिर रहें, तब मुख खोलें। सुषुम्णायाः प्रयत्नेन सम्यक् सर्पमुखाकृतिः। वायुना पूरकाभ्यासं कर्तव्यं साधयेत्ततः¹।।२९।। ग्रन्थिभेदक्रमेणैव चैतन्यानि समीरणैः। सुषुम्णा नाड़ी के प्रयत्न से सर्प के समान मुख की आकृति बनाकर वायु से पूरक का अभ्यास करना चाहिए। तब ग्रन्थियों एक एक कर वायु से भेदन कर विभिन्न स्तर के चैतन्यों की साधना करनी चाहिए। उन्नीय पवनं यत्नात् कुर्यात् तन्मुखगोचरम्।।३०।। चिद्घनानन्दचैतन्यसमीरस्तन्मुखागतः ² , । नयेदूर्ध्वं परन्नुन्नं³ पुनः पुनरपि स्वयम्।।३१।। अभ्यासातिशयेनैव भिनत्यूर्ध्वमनन्यधीः। वायु को खींचकर यत्नपूर्वक उसे मुखेन्द्रिय में संचारित करावें। यह चित् स्वरूप और आनन्द स्वरूप चैतन्य रूप वायु तब मुख में आ जाती है। बार बार धकेलते हुए उसे स्वयं ऊपर की ओर ले जायें। अतिशय अभ्यास करने से एकाग्रचित्त साधक ऊपर मूर्द्धा का भेदन कर लेता है। तत्परं परया⁴ तत्र निःसृतान्तरगोचरः।।३२।। भूमौ वीरासनं बद्धमन्तरालं नयेदपि। इसके बाद परा चक्र से निर्गत तथा बीच में स्थित पवन को वहाँ बीच में लावें। भूमि पर वीरासन में बैठकर यह योग करें। पुनर्यदिवमेवायं द्वितीयमपि भेदयेत्।।३३।। तदन्तान्तर्गतो वायुः शरीरं चोर्ध्वमानयेत्। फिर इसी प्रकार दूसरे चक्र का भी भेदन करना चाहिए। उस चक्र के भीतर जाकर वायु शरीर को ऊपर उठाता है। ——————————————————————
- घ. कर्तव्यस्तेन। 2. ग. विधूतानन्द°, घ. विमलानन्द° । 3. घ. परं मूर्द्धनं। 4. घ. उद्धृत्यापूर्य्य तत्रैव।