अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्रयोविंशोऽध्यायः (169) व्यामोहयति चेतांसि विषयेषु बलान्मुने। दृष्टा स्यात् सर्वजन्तूनां सुखदुःखादिलक्षणा। 1 ।।21।। वह अविद्या चित्त को मोह में डालकर विषयों में जबरदस्ती लगाती रहती है। सुख और दुःख इसी अविद्या का लक्षण है। यह अविद्या सभी प्राणियों में देखी जाती है। अदृष्टान्तर्हिताः सर्वे नापि सर्वत्र संस्थितम्। पश्यन्ति पुरतः साक्षाच्चैतन्यं सर्वगोचरम् ।।22।। इसी अदृष्ट अविद्या से ढके हुए सभी लोग सर्वत्र विद्यमान् और सामने में स्थित सर्वगोचर चैतन्य को नहीं देख पाते हैं। शुद्धिमानप्रमत्तो यः कदाचिद् विषयैरपि। नैव प्रलोभितः साक्षादात्मानं परमीक्षते ।।23।। जो शुद्ध आचरण करनेवाले और प्रमाद रहित हैं, उन्हें विषय कभी लुभा नहीं पाते और वे परम आत्मा को साक्षात् देखते हैं। एवंविधोऽपि यः कश्चित् सच्चिदानन्दलक्षणम्। आत्मानं सर्वगं सम्यक् जानात्येव न संशयः ।।24।। इस प्रकार भी कोई व्यक्ति सत् चित् और आनन्द-स्वरूप सबके द्वारा प्राप्त करने योग्य आत्मा का ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं, इसमें सन्देह नहीं। स जीवन्नेव मुक्तः स्याद्यद्येवं वायुमानयेत्। बहिः सर्व समानीय चैतन्यं स्वगतं पुनः।।25।। यदि मनुष्य अपने अन्दर अवस्थित वायु को रेचक क्रिया के द्वारा बाहर लावे और चैतन्य को अपने अन्दर स्थापित करे तो इसी जीवन में मुक्त हो जाते हैं। पूरकेनैव योगेन सर्वतः स्थितमन्ततः। सम्यगाधाय चाधारे ध्यायेद् राममनन्यधीः।।26।। प्राणायाम के अन्तर्गत पूरक के योग से (वायु को भीतर करते हुए) सर्वत्र स्थित श्रीराम को अन्ततः आधार-चक्र पर स्थापित कराकर एकाग्र होकर ध्यान करना चाहिए। शरीरान्तर्गतं वायुं दशधा तत्र तत्र तु। एकीकृत्य प्रयत्नेन कुम्भकेनैव योगतः 2 ।।27।।
- घ. दृष्टा स्यात् सुखदुःखादाविच्छाद्वेषादिलक्षणा। 2. घ. यत्नतः।