भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

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पृष्ठ 229

(168) अगस्त्य-संहिता बुभुत्सुः कर्मतत्त्वज्ञो दृष्टिमानप्रमादितः। यदि पश्येत् परं ज्योतिरेकं सर्वत्र पश्यति।।15।। कर्म के तत्त्वों को जाननेवाला भोग चाहनेवाला भी यदि सावधान होकर दृष्टि रखते हुए देखे तो उस एकमात्र परम ज्योति का दर्शन सर्वत्र करेगा। यद्यनन्यमनाः पश्येद्विद्रुक्षुर्विषयेष्वपि। तच्चैतन्यं वरं पश्येन्नान्यत् किञ्चिदपि स्वयम्।।16।। यदि चैतन्य का दर्शनाभिलाषी बिना दूसरी ओर ध्यान दिए विषयों में देखे तो वही श्रेष्ठ चैतन्य स्वयं दिखाई पड़ेगा, दूसरा कुछ भी नहीं। पापिष्ठाः क्रूरकर्माणस्ततो नित्यं बहिःकृताः।। तत्तत्फलार्थिनः सर्वे कथं पश्यन्ति तद् वद।।17।। जो पापी हैं, क्रूर कार्य करते हैं और इस कारण वे सदा बहिष्कृत रहते हैं वे अपने क्रूर कर्म का भी फल चाहते हैं, वे कैसे चैतन्य को देखते हैं, यह कहिए। करस्थं नैव जानाति पुमान् विषयनिश्चलः। अत्यन्तान्तर्हितं वेत्ति विजिज्ञासुरतथाविधः।।18।। विषयों में सदा आसक्त लोग अपनी हथेली पर स्थित उस परम ज्योति को इस विधि से नहीं जान पाते और चैतन्य को जानने की इच्छा रखनेवाले उसे अत्यन्त प्रच्छन्न मान लेते हैं। पश्य सर्वात्मना सर्वं सर्वत्रापि तपोनिधे। प्रकाशते स्वयं साक्षात् सच्चिदानन्दलक्षणः।।19।। हे तपोनिधे! हर प्रकार से सबकुछ देखो कि हर जगह साक्षात् सत् चित् और आनन्द स्वरूप भगवान् प्रकाशित हैं। ततोऽस्ति न परं किञ्चिद् वासत् तत् तद् विलक्षणम्।¹ तत्तिरस्करिणीं प्राहुरविद्यां ज्ञानिनामपि।।20।। उनसे परे कुछ भी नहीं है, असत् भी नहीं है, अपरिभाषित कोई तत्त्व नहीं है। उस भगवान् और प्राणी के बीच ज्ञानियों में भी एक पर्दा है, जिसे अविद्या कहते हैं।

  1. घ. ततोऽस्मान्न परं किञ्चिद् बाह्यमेतद्वि लक्षणम्।