अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसंवर्द्धितः शश्वदयं वर्षे वर्षे प्रयत्नतः ।।47।। यद्धितं स्वस्य सततं तदानीमायतावपि। तत्सर्वं सम्परित्यज्य बहिरेव प्रवर्त्तते ।।48।। दिनानुदिन पक्ष मास और ऋतु के अनुसार बढ़ता हुआ वह उन उन समय के लिए उक्त विषयों के द्वारा भली भाँति प्रकट हो जाता है। वह शरीरधारी पिता, भाई के साथ प्रतिदिन प्रसन्न होता है। वह साल दर साल बढ़ता हुआ, उसका जो हमेशा कल्याणकारी है, उस परमधाम तथा परमेश्वर का साथ छोड़कर बाहर ही दौड़ता है। यद्ययं सर्वमुत्सृज्य पश्येदात्मानमात्मनि। एतावतेव संसारभवदुःखैर्विमुच्यते ।।49।। यदि वह जीव सब कुछ छोड़कर आत्मा में अपने को देखे, तो इससे ही वह संसार में जन्म लेने के दुःखों से मुक्त हो जाता है। इत्यगस्त्यसंहितायां परमरहस्ये शरीरोत्पत्तिर्नाम द्वाविंशतितमोऽध्यायः।। अथ त्रयोविंशोऽध्यायः अगस्त्य उवाच अद्वैतानन्दचैतन्यशुद्धसत्त्वैकलक्षणः । बहिरन्तः सुतीक्ष्णात्र स्वयमात्मा प्रकाशते ।।1।। अनाद्यसृष्टमेवात्र¹ कारणन्तत्र गोपते । न्यूनं वाप्यतिरिक्तं वा सर्वत्रापि तपोनिधे ।।2।। हे सुतीक्ष्ण! अद्वैत, आनन्दस्वरूप, चैतन्यस्वरूप, शुद्ध, सत्त्व, आ एकत्व इन छह लक्षणों वाली आत्मा स्वयं मनुष्य के भीतर और बाहर प्रकाशित रहती है। इस आत्मा का कारण अनादि और अदृष्ट है, जो चाहे कम मात्रा में हो या अधिक मात्रा में, सभी स्थितियों में आत्मा में प्रकाशित होती है। आधिक्ये विषयैर्नित्यं बहिरेव प्रतीयते। न्यूनेऽपि विषयात्यन्ता प्राप्या तस्माद् बहिर्भवेत् ।।3।।
- घ. अनाद्यसृष्टमेवात्र।