अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
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आत्मा के कारणों की अधिकता होने पर आत्मा विषयों के साथ बाह्य रूप में प्रतीत होती है और कारणों की न्यूनता होने पर विषयादि के साथ संयुक्त होकर उससे बाहर हो जाती है। अतो जानीहि चात्मानमात्मन्येव निरन्तरम्। आसक्तो विषयैर्नित्यं स्वस्यादृष्टोपकल्पितैः ।।4।। यत्र यद्यत् प्रपञ्चेऽस्मिन् जङ्गमाजङ्गमात्मके। तत्र सर्वत्र चैतन्यं तिष्ठत्येवं निरन्तरम् ।।5।। इसलिए आत्मा को निरन्तर आत्मा में ही स्थित जानो, किन्तु अपने भाग्य के कारण जीव इस मिथ्या विषयों के साथ आसक्त हो जाता है। यह आसक्ति इस स्थावर और जंगम रूप संसार में जहाँ जहाँ होती है, उन सभी जगहों पर निरन्तर चैतन्य की सत्ता अवश्य होती है। कार्यात्मना प्रपञ्चोऽयं चैतन्यं कारणात्मना। अनुस्मृतं हि सर्वत्र भूतानाञ्चात्र भौतिके ।।6।। स्वयमेवात्र चैतन्यं तस्मादन्यन्न किञ्चन। यह प्राणियों का यह भौतिक संसार कार्य रूप है और चैतन्य कारण रूप में सर्वत्र अनुभव किया जाता है। यहाँ स्वयं चैतन्य की सत्ता है और उससे परे दूसरे कुछ भी नहीं है। परमात्मा च जीवात्मा ब्रह्म सच्च तदोमिति ।।7।। ज्ञानमानन्दमित्येत् सर्वं चैतन्यवाचकम्। चैतन्यान्न परं किञ्चिद् दृश्यते सर्वजन्तुषु ।।8।। परमात्मा, जीवात्मा, ब्रह्म, सत्, ॐकार, ज्ञान, आनन्द- ये सबके सब चैतन्य के वाचक हैं। चैतन्य से परे सभी प्राणियों में कुछ भी नहीं दिखाई पड़ता है। प्रबुद्धस्याप्रमत्तस्य पृथिवीव घटादिषु। अतः शुद्धं पृथिव्यादौ दृश्यते सर्वदेहिनाम् ।।9।। अदृष्टं कल्पयेद्यत्र स्वीयं स्वस्मिन् भवेदिह। जो प्रबुद्ध हैं और अहंकारी या पागल नहीं हैं, उनकी दृष्टि में जिस प्रकार घट आदि में पृथिवी तत्त्व है, उसी प्रकार सभी प्राणियों के अन्तस्तत्त्व पृथ्वी आदि पाँच तत्त्वों में दृष्टिगोचर होते हैं। अदृष्ट आत्मा की जहाँ कल्पना की जाती है, वहाँ स्वयं में अपनी आत्मा होती है।