अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 225, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ें(164) अगस्त्य-संहिता नागः कूर्मोऽथ कृकलो³ देवदत्तो धनञ्जयः ।। 39 ।। वायवो दश देहेऽस्मिन् सप्तधातुषु संस्थिताः । सप्तैवान्येषु दोषेषु स्वेदक्लेदान्तगामिनः ।। 40 ।। इसके अतिरिक्त सात धातुओं में नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त और धनंजय ये पाँच वायु हैं। ये दश वायु शरीर में होते हैं। दूसरे दोष उत्पन्न करनेवाले सात वायु हैं, जो पसीना और मूत्र के अंग में रहते हैं। एवं शरीरमासाद्य प्रसूतिसमये भृशम् । स्वमातरं व्यथयन्नन्तमुदरे विनिवर्तते ।। 41 ।। नवमे दशमे मासि शरवन्निःसरेदपि । पूयशोणितविण्मूत्रपरीताङ्गोऽथ सज्ज्वरः ।। 42 ।। योनेरवनिमासाद्य क्लेशातिशयमोहितः । रोदित्यच्चैर्विषण्णः सन् विस्मरेच्च मनोगतम् ।। 43 ।। इस प्रकार, शरीर प्राप्त कर जीव समय होने पर प्रसव के समय बार बार अपनी माता को अनन्त कष्ट देता हुआ उसके उदर में पहुँच जाता है और नवम या दशम मास तीर की तरह बाहर निकल जाता है, अर्थात् जन्म लेता है। मवाद, शोणित, विष्ठा और मूत्र से लिपटा तथा तप्त शरीर वाला शीघ्र ही योनिद्वार से ही जन्म लेकर अत्यधिक कष्ट से व्याकुल होकर जोर-जोर से रोता है और अपने मन की सभी स्मृतियों को वह भूल भी जाता है। अमृतत्वमनावृत्तिलक्षणं साध्यमात्मनः । तत्त्वज्ञानबहिर्भूतो भूयो भूयो विमोहितः ।। 44 ।। आत्मानमपि विस्मृत्य बहिरेव प्रधावति । क्षुत्पिपासातुरो नित्यं स्तनमेव किलेच्छति ।। 45 ।। अपने अभीष्ट, अमृत नामक मोक्षस्वरूप ब्रह्म को वह जीव भूल जाता है और बाहर की ही ओर दौड़ पड़ता है; क्योंकि वह उस तत्वज्ञान से बहिर्भूत होकर बार बार मोहित हो जाता है। भूख और प्यास से व्याकुल होकर वह स्तन ही चाहता है। दिने दिने वर्द्धमानः पक्षे मासि ऋतावपि । तत्तत्कालोक्तविषयैः सम्यगाविष्कृतो भवेत् ।। 46 ।। पितृभ्यो बन्धुभिः सम्यक् कायो नित्यं प्रमोदितः ।