अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 27, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रस्तावना (25) गच्छति। इत्यगस्त्यसंहितायां परमरहस्ये हनुमान्मन्त्रयंत्रश्रीरामकवचोद्धारकथनं नाम द्वात्रिंशोध्यायः। 32 अश्लोकसंख्या 2000 लिखतं लालासीताराम श्रीचित्रकूटअस्थाने श्रीरामजीघाटमंदाकिनीपैसुरनीतटे संगमे।। पुस्तकं श्रीश्रीश्रीश्री महंत आचार्य वलभद्रदासजी की वैसाष वदि 12 संवत् 1902 रामः रामः रॉमः। इस पाण्डुलिपि के अनेक अध्यायों में श्लोक संख्या सन्देहास्पद है। उदाहरण के लिए पंचम अध्याय के प्रथम श्लोक में संख्या नहीं है तथा द्वितीय श्लोक को ही प्रथम श्लोक माना गया है। आगे भी सर्वत्र श्लोक संख्या नहीं है। कई श्लोकों के बाद जब संख्या दी जाती है, तबवह संख्या कहीं कम पड़ जाती है, तो कहीं अधिक हो जाती है। जहाँ संख्या अधिक हो जाती है, वह स्थल अधिक विचारणीय हो जाता है, क्योंकि वह आदर्श मातृका से प्रतिलिपि करते समय कुछ पंक्तियाँ छूट जाने की स्थिति का द्योतक है। इसमें 31वाँ अध्याय सम्पूर्ण खण्डित है। लिपिकार ने 'एकत्रिंशोऽध्यायः' प्रारम्भ कर 32वाँ अध्याय लिखना प्रारम्भ कर दिया है। पाण्डुलिपि में अशुद्धियों की भरमार है। अनुस्वार, विसर्ग, रेफ, उकार, एकार, ऐकार आदि मात्राएँ टूट गयी हैं। ये मात्राएँ जीरॉक्स कापी होते समय भी गायब हो सकती हैं, ऐसा मानकर हमने ऐसे स्थलों को सम्पादित पुस्तक की पाद- टिप्पणी में यथास्थिति दिखाने के लिए नहीं लिया है। ऐसे स्थलों पर अन्य पाण्डुलिपियों तथा बंगाल से प्रकाशित प्रति का उपयोग कर पाठोद्धार किया गया है, किन्तु इस पाण्डुलिपि के पाठ एवं उसकी मूल भावना को सुरक्षित रखा गया है। इतना करने के बाद भी चित्रकूट के घाट पर एक महन्त के उपयोग हेतु लिखित होने के कारण परम्परा और पाठ की दृष्टि से सरस्वती भवन की यह पाण्डुलिपि महत्त्वपूर्ण है। वर्तमान सम्पादन इस पाण्डुलिपि के पाठ का प्रतिनिधित्व करता है। पाण्डुलिपि 'ख' सरस्वती भवन पुस्तकालय, सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय में सुरक्षित यह अगस्त्य-संहिता की अपूर्ण पाण्डुलिपि है। इसमें पत्र-संख्या 1 से 8 तक लगातार है तथा एक अन्य 11वाँ पत्र उपलब्ध है। इस प्रकार इस पाण्डुलिपि में आरम्भ से षष्ठ अध्याय के चतुर्थ श्लोक के पूर्वार्द्ध तक तथा सप्तम अध्याय के तृतीय श्लोक के तृतीय चरण से अष्टम अध्याय के प्रथम श्लोक के द्वितीय चरण तक उपलब्ध है।