अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें(24) अगस्त्य-संहिता पैसुरनी नदी के संगम पर किसी मन्दिर में लिखा गया है, जो रामोपासना का एक प्रसिद्ध स्थल है। इस पाण्डुलिपि की परम्परा की प्रामाणिकता असंदिग्ध है। इस ग्रन्थ के सम्पादन के क्रम में सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति महोदय के प्रति हम आभार प्रकट करते हैं, जिन्होंने हमें अनुमति देते हुए पाण्डुलिपियों की छायाप्रति उपलब्ध करायी है। इसके साथ ही प्राच्यविद्या के विद्वान् श्री ब्रह्मानन्द चतुर्वेदीजी ने कठिन परिश्रम कर सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय से सम्पर्क कर उनसे अनुमति लेकर हमें सरस्वती भवन पुस्तकालय से इस पाण्डुलिपि की छायाप्रति उपलब्ध करायी है, जिसके लिए हम उनके प्रति आभारी है। साथ ही, सरस्वती भवन के अधिकारी भी धन्यवाद के पात्र हैं, जिन्होंने पाण्डुलिपि की प्रति मिलान करने के लिए श्री चतुर्वेदीजी को उपलब्ध कराकर इस कार्य में हमें सारस्वत सहयोग किया है। इन पाण्डुलिपियों तथा आधार-ग्रन्थ का विवरण इस प्रकार है- पाण्डुलिपि 'क' पाण्डुलिपि संख्या- 72223 प्रवेश संख्या- 106918 स्थान- सरस्वती भवन पुस्तकालय, सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी। विषय प्रविष्टि- पुरोहिती (पौरोहित्य?) आकार - 11 X 5.5 इंच लिखित स्थान- 9 X 4 इंच प्रति पत्र पंक्तिसंख्या- 12 प्रति पंक्ति अक्षर संख्या - 45-47 स्थिति- पूर्ण, पत्रसंख्या 50। (31वाँ अध्याय अनुपलब्ध) लिपिकाल- वैशाख कृष्ण द्वादशी संवत् 1902 अर्थात् 4 मई 1845 ई.। लिपिकार- लाला सीताराम। स्थान- चित्रकूट, गंगा एवं परसुरनी नदी के संगम पर। पुस्तकी के अधिकारी- श्री श्री श्री श्री महन्त बलभद्र दास। आरम्भ- श्रीमते रामानुजाय नमः। अगस्त्यो नाम विप्रर्षिः सत्तमो गौतमीतटे। कदाचिद्दण्डकारण्ये सुतीक्ष्णस्याश्रमं ययौ।।1।। प्रत्युज्जगाम तं भक्त्या गंधपुष्पाक्षतोदकैः। पाद्यार्घ्याद्यर्हणां चक्रे तस्मै ब्रह्मविदे मुनिः।।2। अन्त- आयुरारोग्यमैश्वर्यपुत्रपौत्रप्रवर्द्धनम्। सर्वान् कामानवाप्नोति विष्णुलोके स