अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 25, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रस्तावना (23) के साथ हुआ। भूमिका में सम्पादक महोदय ने सूचना दी है कि उनके पास 32 अध्यायों की पाण्डुलिपि है, किन्तु अर्थाभाव के कारण वे तत्काल 11 अध्याय ही प्रकाशित कर रहे हैं। यह प्रति भी मेरे पास उपलब्ध नहीं है। इन प्रकाशित कृतियों के अतिरिक्त 'अगस्त्य-संहिता' की अनेक पाण्डुलिपियाँ उपलब्ध हैं। कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय, दरभंगा के पुस्तकालय में इसकी एक पाण्डुलिपि उपलब्ध है, जिसकी परिग्रहण संख्या 2429 (1858) है। इसमें भी 32 अध्याय हैं। इसका आरम्भ 'श्रीरामो जयति' से हुआ है। देवनागरी लिपि में लिखी इस पाण्डुलिपि में यद्यपि लेखनकाल नहीं दिया गया है, किन्तु पाण्डुलिपि के विशेषज्ञों की दृष्टि में यह कम से कम 200 वर्ष प्राचीन होनी चाहिए। एक अन्य पाण्डुलिपि डी. ए. वी. कालेज, चंडीगढ़ में भी उपलब्ध होने की सूचना है। इस प्रकार अगस्त-संहिता की कई पाण्डुलिपियाँ हैं, जिनमें केवल 32 अध्याय हैं, तथा ग्रन्थ को पूर्ण माना गया है। सन् 1356 से 1371 के बीच विजयनगर साम्राज्य के संस्थापक बुक्का ने तुर्कों के विरुद्ध लड़ाई लड़ने के लिए अपने भाई हरिहर के पुत्र कुमार कम्पण को अभियान पर भेजा था। कुमार कम्पण की सेना के एक भाग का नेतृत्व भारद्वाज- गोत्रीय एक ब्राह्मण गोपनारायण ने किया था। कांचीपुरम् के एक शिलालेख के अनुसार इसी गोपनारायण ने श्रीरंगम् के मन्दिर का भी जीर्णोद्धार कराया था। कहा जाता है कि इस गोपनारायण ने 'अगस्त्य-संहिता' पर एक व्याख्या लिखी थी, किन्तु 'मानसतरंगिणी' नामक वेबसाइट के लेखक ने स्पष्ट स्वीकार किया है कि मैंने इस व्याख्या की पाण्डुलिपि का अवलोकन नहीं किया है— He also composed a commentary on the Agastya-Samhita but I have not been able to examine this manuscript to further comment on the issue. वर्तमान सम्पादन इस सम्पादन में हमने कलकत्ता से प्रकाशित संस्करण का उपयोग करते हुए सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय के सरस्वती भवन पुस्तकालय में उपलब्ध देवनागरी लिपि की पाण्डुलिपि से उसका मिलान किया है। सरस्वती भवन की यह पाण्डुलिपि कई अर्थों में महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यह चित्रकूट में गंगा और