भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

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पृष्ठ 271

(210) अगस्त्य-संहिता प्रातः स्नात्वा च गायत्रीं¹ जप्त्वा सन्ध्यामुपास्य च ।। ४० ।। दशाक्षरेण मन्त्रेण देवेशं मनसा स्मरेत्। देवदेवं प्रणम्याथ पूर्ववत् पूजयेद् व्रती ।। ४१ ।। प्रातःकाल में स्नान कर गायत्री जप एवं सन्ध्यावंदन कर दशाक्षर मन्त्र से देवेश श्रीराम का मन से स्मरण करें। देवों के देव श्रीराम को प्रणाम कर व्रत करने वाले पूर्वोक्त विधि से पूजा करें। इत्यगस्त्यसंहितायां परमरहस्ये रामनवमीव्रतविधानं नाम अष्टाविंशोऽध्यायः ।। अथ एकोनत्रिंशोऽध्यायः सुतीक्ष्ण उवाच सर्वेतिहासतत्त्वज्ञ श्रुतिस्मृतिविदां वर।² न्यासा बहुविधाः प्रोक्तास्त्वयादौ मन्त्रयोगतः ।। 1¹ ।। तत्र कश्च कथं कुर्यात् कथयस्व महामुने। सुतीक्ष्ण ने पूछा- हे महामुनि अगस्त्य! आप सभी इतिहासों का तत्त्व जानते हैं, वेद और स्मृतियों के ज्ञानियों में श्रेष्ठ है। आपने पूर्व में मन्त्र के योग से अनेक प्रकार के न्यासों का उपदेश किया, अब यह कहें कि साधक किस न्यास को कैसे करेगें। अगस्त्य उवाच न्यासः स्यान्मन्त्रसन्नाहो न्यासहीनो न सिद्धिदः ।। २ ।। तस्मान्न्यासः प्रयत्नेन कर्तव्यः सिद्धिमच्छता। अगस्त्य बोले- मन्त्र का कवच न्यास कहलाता है, अतः न्यासरहित मन्त्र से सिद्धि नहीं मिलती है। इसलिए सिद्धि चाहते हुए साधक प्रयत्नपूर्वक न्यास करें। वैष्णवानां हि मन्त्राणां सर्वेषां च विशेषतः ।। ३ ।। न्यासः केशवकीर्त्यादि तत्त्वन्यासः ततः परम्। न्यासः परमहंसाख्य ईरितः कविभिः सदा ।। ४ ।।


१. ग. मावित्रीं। २. ग. श्रुतिस्मृतिविशारद ।