अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 272, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकोनत्रिंशोऽध्यायः (211) सभी वैष्णव-मन्त्रों का तत्त्व-न्यास केशवकीर्त्यादि-न्यास है। इसके बाद 'परमहंस' नामक न्यास कहलाता है। मातृकां विन्दुसंयुक्तां शुद्धां मन्मथसंयुताम्। मायावेदादिसंयुक्तां केशवादिन्तथैव च ।।5।। आभ्यन्तरीं मातृकां च कृत्वानुष्ठानमाचरेत्। बिन्दु युक्त केवल मातृका वर्ण अथवा कामबीज (क्लीं), माया (ह्रीं) वेद (ॐ) आदि से युक्त तथा केशवादि से युक्त न्यास तथा आभ्यन्तर मातृका न्यास कर अनुष्ठान करना चाहिए। अस्यानुष्ठानमखिलं सकलं मुनिसत्तम ।।6।। अशक्तश्चेन्मन्त्रमात्रमुच्चरन् नियतोऽन्वहम्। सर्वान् कामानवाप्नोति स रामो राममाप्नुयात् ।।7।। इसका समग्र अनुष्ठान सफल होता है। यदि साधक अशक्त हो, तो नियमपूर्वक प्रतिदिन केवल मन्त्र का जप करता हुआ सभी कामनाओं को प्राप्त कर लेता है। वह रामस्वरूप होकर श्रीराम को प्राप्त करता है। सुतीक्ष्ण उवाच श्रुतं त्वत्तो मया ब्रह्मन् रामस्याद्भुतकर्मणः। विधानं सर्वमन्त्राणां सरहस्यमशेषतः ।।8।। दशाक्षरादिमन्त्राणां विधानं च विशेषतः। ज्ञानञ्च सम्यग्विधिवद् ब्रह्मप्राप्त्यैक साधनम् ।।9।। इदानीं श्रोतुमिच्छामि प्रतिष्ठाविधिमञ्जसा। कदा कुत्र कथं चेति सर्वज्ञस्त्वं यतोऽसि मे ।।10।। ब्रूहि श्रद्दधतः स्वामिन् यतः कारुणिको भवान् ।।11।। सुतीक्ष्ण बोले- अद्भुत कृत्यों के कर्ता श्रीराम की पूजा का विधान तथा उनके सभी मन्त्रों का रहस्य मैंने आपसे सुन लिया। दशाक्षर आदि मन्त्रों का विशेष विधान तथा विधिवत् सम्यक् ज्ञान भी प्राप्त किया, जो ब्रह्मप्राप्ति का साधन है। अब संक्षेप में मूर्ति-प्रतिष्ठा की विधि सुनना चाहता हूँ कि किस दिन, किस स्थान पर और कैसे प्रतिष्ठा करनी चाहिए। आप तो सबकुछ जानते हैं; आपके प्रति मेरी श्रद्धा है अतः हे स्वामी! मुझे यह बतलाएँ; क्योंकि आप तो करुणा करनेवाले हैं।