भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

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पृष्ठ 273

(212) अगस्त्य-संहिता

अगस्त्य उवाच सम्यक् पृष्टं त्वया विद्वन् गुह्याद् गुह्यतमं परम्। यः पश्यति हरेः पुण्यां प्रतिष्ठां विधिवत्कृताम् ।।12।। सोऽपि पुण्यतमो लोके पापात् सद्यो विमुच्यते। श्रीरामस्य प्रतिष्ठायाः फलं वक्तुं पितामहः ।।13।। न शक्तः स्यान्महेशोऽपि सहस्त्रवदनोऽपि च। अगस्त्य बोले- हे सुतीक्ष्ण! आपने ठीक ही प्रश्न किया। यह जिस किसी भी व्यक्ति को कहने योग नहीं है, सँभालकर रखने की वस्तु है। जो विधानपूर्वक की गयी विष्णु की मूर्ति-स्थापना का दर्शन करते हैं, वे इस संसार में श्रेष्ठ पुण्य प्राप्त करते हैं और पापों से मुक्त हो जाते हैं। श्रीराम की प्रतिष्ठा का फल बखानने में ब्रह्मा, महेश और शेषनाग भी समर्थ नहीं हैं। येन केन प्रकारेण यत्र कुत्रापि वा मुने ।।14।। यैः कैश्चिद् कृतं चेत् स्यात् लोके धन्यतमा हि ते। कालप्रतीक्षां नो कुर्याद् विधिं चापि विशेषतः ।।15।। यदैव भक्तिरुत्पन्ना तदा स्थाप्यो रघूद्वहः। हे मुनि! जिस किसी भी विधि से जहाँ कहीं भी जो कोई व्यक्ति श्रीराम की मूर्ति-प्रतिष्ठा करते हैं, वे सबसे अधिक धन्य हो जाते हैं। इसमें अच्छे मुहूर्त की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए, उचित विधान के भी भरोसे नहीं रहना चाहिए, जिस दिन ही भक्ति उपजे, उसी दिन श्रीराम की स्थापना करनी चाहिए। विनापि चन्द्रतारादिबलं नक्षत्रमेव च ।।16।। चैत्रशुद्धनवम्यां तु प्रतिष्ठाप्यो रघूत्तमः। अशक्तश्चेन्नवम्यां तु माघशुद्धदिनेऽपि वा ।।17।। चैत्र शुक्ल नवमी को चन्द्र, तारा आदि का बलाबल और नक्षत्रों की शुद्धि न रहने पर भी श्रीराम की स्थापना करें। माघ मास के शुक्लपक्ष की नवमी तिथि को भी स्थापना करें। चन्द्रतारादिसम्पन्ने प्रतिष्ठाप्यो विधानतः। मार्गशीर्षेऽथवा पूर्णे वैशाखे वा समाहितः ।।18।। मूलादिदोषरहिते प्रतिष्ठा राघवस्य तु। प्रकुर्याच्च विधानेन शक्त्या भक्त्या प्रयत्नतः ।।19।।