अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 29, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रस्तावना (27) पाण्डुलिपि संख्या- 14673 प्रवेश संख्या- 21161 स्थान- सरस्वती भवन पुस्तकालय, सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी। विषय प्रविष्टि- पुराणेतिहास आकार – 28 X 15 से.मी. लिखित स्थान- 20 X 7.5 से.मी. प्रति पत्र पंक्तिसंख्या- 10 प्रति पंक्ति अक्षर संख्या - 40 आरम्भ- न स्पृशतो रामोपासनपूर्वकं। यदा रामोहमित्येवं चिन्तयेदप्यनन्यधी ।।28।। स्थिति- अपूर्ण, पत्रसंख्या 39 तथा 47-65 तक। आधार-ग्रन्थ 'घ' प्रस्तुत सम्पादन के क्रम में पाठोद्धार एवं पाठान्तर के आदि के निर्देश के लिए हमने बंगाल से प्रकाशित पुस्तक का उपयोग किया है, जिसे 'घ' के रूप में रखा है। इस ग्रन्थ में 32 अध्याय हैं, किन्तु 32 वें अध्याय के अन्त में पाण्डुलिपि ‘क’ की अपेक्षा कम श्लोक हैं। इसमें भी कतिपय स्थलों पर पाठोद्धार अपूर्ण है। उन स्थलों पर अन्य पाण्डुलिपियों से मिलान करने पर अर्थ स्पष्ट हो जाते हैं। साथ ही, पाण्डुलिपि ‘क’, एवं ‘ग’ की अपेक्षा पाठ भेद अधिक है। ऐसा प्रतीत होता है कि दोनों पाठों का अलग-अगल विकास हुआ है, जिसपर स्थानीय प्रभाव है। इसके सम्पादक एवं अनुवादक पं. कमलकृष्ण स्मृतितीर्थ ने संक्षेप में अनुवाद कर इसकी विषयवस्तु को प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। अगस्त्य के नाम पर अनेक रचनाएँ महामुनि अगस्त्य वैदिक ऋषि है। बृहद्देवताकार शौनक ने लिखा है कि अगस्त्य की बहन ब्रह्मवादिनी थीं। वे स्वयं भी ऋग्वेद के अनेक सूक्तों के द्रष्टा हैं। रामायण में अरण्यकाण्ड में अगस्त्य की विस्तृत कथा आयी है, जिसमें आतापी राक्षस को निगल जाने की कथा है। युद्धकाण्ड में भी रावण के साथ युद्ध करने के क्रम में श्रीराम की बेचैनी दिखाई पड़ने पर अगस्त्य मुनि आकर उन्हें सूर्योपासना का उपदेश करते हैं, जो ‘आदित्यहृदय’ के नाम से विख्यात है। राज्याभिषेक के बाद भी अगस्त्य की चर्चा उत्तरकाण्ड में आई है।