भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

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(28) अगस्त्य-संहिता

अगस्त्य समुद्र को शोषित करनेवाले ऋषि के रूप में पौराणिक साहित्य में चर्चित हैं। अगस्त्य की स्तुति में एक प्रसिद्ध मन्त्र है- आतापी भक्षियो ये वातापी च महाबलः। समुद्रः शोषितो येन स मेऽगस्त्यः प्रसीदतु ।। ऐसा प्रतीत होता है कि गुप्तकाल के बाद में जब आगम, तन्त्र एवं अन्य प्रकार के चमत्कारपूर्ण जादू-टोना का बोलबाला समाज में बढ़ा, तब इस प्रकार के चमत्कारपूर्ण कार्यों के प्रवर्तक तथा विज्ञानी ऋषि के रूप में अगस्त्य चर्चित रहे। न केवल भारत में अपितु इन्डोनेशिया में भी नवम शताब्दी में अगस्त्य की मूर्तियाँ स्थापित की गयी थीं। प्रम्बनान, जावा, इन्डोनेशिया के पुरातात्विक संग्रहालय में महामुनि अगस्त्य की एक प्रतिमा भगवान् शिव के साथ है, जो प्रम्बनान के चण्डी-शिव मन्दिर में स्थापित थी। इन मन्दिर का निर्माण काल 9वीं शती है। इस चित्र में वाम भाग में स्थित अगस्त्य की इस प्रतिमा में उन्हें त्रिशूल तथा जपमाला के साथ दिखलाया गया है। यज्ञोपवीत, तुन्दिल उदर तथा बलिष्ठ काया की यह प्रतिमा अगस्त्य की पहचान है। अगस्त्य के नाम पर विभिन्न प्रकार की रचनाएँ उपलब्ध हैं। प्रो. कुप्पुस्वामी शास्त्री, पी. पी. सुब्रह्मण्यम् शास्त्री, सी. कुन्हन राजा, वी. राघवन्, ई. पी. राधाकृष्णन् आदि के सम्पादन में मद्रास विश्वविद्यालय से 1937 ई. में प्रकाशित 'न्यू कैटेलोगस कैटेलोगोरम' में अगस्त्य के नाम पर निम्नलिखित रचनाओं की पाण्डुलिपि पाये जाने का उल्लेख किया गया है- अगस्तिकल्प- तन्त्रशास्त्र अगस्त्य-कल्प- शिल्पशास्त्र का ग्रन्थ है। अगस्त्य-कल्प- रामोपासना का आगमशास्त्रीय ग्रन्थ है। जिसका उल्लेख रामार्चन-