भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

पृष्ठ 41, कुल 337 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 41

प्रस्तावना (39)

'अगस्त्य-संहिता का प्रतिपाद्य विषय 'अगस्त्य-संहिता' आगम शास्त्र की परम्परा में रामोपासना का प्रतिनिधि ग्रन्थ है। इसमें रामोपासना के कर्मकाण्ड का विस्तार से प्रतिपादन है, जिसे गृहस्थों के लिए भोग एवं मोक्ष दोनों का प्रदाता कहा गया है। कर्मकाण्ड के अन्तर्गत षोडशोपचार, पंचोपचार, एकादशोपचार पूजा विधि का वर्णन किया गया है। इस कर्मकाण्ड के अन्तर्गत नित्य, नैमित्तिक तथा काम्य, तीनों में हवन-कर्म को अनिवार्य माना गया है। यह 'अगस्त्य-संहिता' की परम्परा की विशेषता है। इस ग्रन्थ में गार्हस्थ्य-धर्म को भी महिमा-मण्डित किया गया है तथा सांसारिक भोग को मोक्ष का बाधक न मानकर मोक्ष का साधक माना गया है, बशर्ते कि भोग, भोग्य और भोक्ता तीनों के रूप में श्रीराम को स्थापित कर भोग किया जाये और देवता के प्रति पूर्ण समर्पण की भावना विकसित रहे। इस सम्पूर्ण समर्पण तथा अनन्या भक्ति की महिमा 'अगस्त्य-संहिता' में सर्वत्र गायी गयी है। इस संहिता में केवल 'भक्त्या' शब्द का प्रयोग 33 स्थलों पर मिलता है, जो कर्मकाण्ड में भी भक्ति की सहभागिता को व्यक्त करता है। इस कर्मकाण्ड को जहाँ गृहस्थों के लिए अनिवार्य बतलाया गया है, वहाँ यतियों, संन्यासियों के लिए इसे हेय मानते हुए कहा गया है कि यतिगण किसी भी साधन से पूजा न करें, क्योंकि ये साधन हिंसा के बिना सम्भव नहीं हैं और यतियों के लिए अहिंसा परम धर्म है। यतियों के लिए योग-पद्धति का विवरण दिया गया है, जिसके माध्यम से अष्टाङ्ग योग का पालन करते हुए योगी ब्रह्मस्वरूप श्रीराम में विलीन होकर मुक्त जाते हैं। योग-मार्ग का पालन गृहस्थों के लिए असम्भव मानकर गृहस्थों को इस पथ पर नहीं चलने का सुझाव देते हुए कहा गया है कि यति धर्म में यदि आसक्ति पाप का कारण होता है, तो गार्हस्थ्य-धर्म में अनासक्ति भी पाप है। यदि गृहस्थ हैं, तो सांसारिक विषयों से अनासक्ति नहीं दिखाएँ और यदि वैराग्य उत्पन्न हो जाने के कारण यति-धर्म में प्रवृत्त हैं, तो आसक्ति न रखें। दोनों ही स्थितियाँ पाप के कारण हैं। गृहस्थों के लिए केवल ज्ञान को भी श्रेयस्कर नहीं बतलाया गया है। केवल ज्ञान हो जाने से, जीव और ब्रह्म की एकता का ज्ञान हो जाने से गृहस्थ को न तो मुक्ति मिल सकती है न ही इस संसार में सुख मिल सकता है। अतः गृहस्थ को निष्काम भाव से दान, जप, हवन, पूजन, भजन कीर्तन आदि करते हुए जीव और ब्रह्म की एकता का ज्ञान करना चाहिए।