अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 40, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ें(38) अगस्त्य-संहिता
अध्याय से यदि अगस्त्य-संहिता का अन्त रहता तो अन्त में ग्रन्थ समाप्ति की पुष्पिका रहती, नमस्क्रियात्मक या आशीर्वादात्मक मंगलाचरण होता। साथ ही पत्रांक दुबारा लिखा गया है। पत्र संख्या 35 की वर्द्धित छाया यहाँ प्रमाण के लिए प्रस्तुत है- [चित्र: पाण्डुलिपि का अंश - पत्र संख्या ३५] इस प्रकार यह स्पष्ट है कि उक्त पाण्डुलिपि पूर्ण एवं स्वतन्त्र है तथा पाण्डुलिपियों के बंडल में इसके साथ इसी लिपिकार की दूसरी पाण्डुलिपि रहने के कारण बाद में किसी ने भ्रमवशात् लगातार पत्रांक डाल दिया है। इस अध्याय में सीताजी की स्तुति है, जो काव्यात्मकता की दृष्टि से इतनी उच्च कोटि की रचना है कि इसे आगमशास्त्र के अन्तर्गत न रखकर विशुद्ध भक्ति- काव्य की कोटि में रखना अपेक्षित होगा। आचार्य बलदेव उपाध्याय ने 'वैष्णव सम्प्रदायों का साहित्य एवं सिद्धान्त' ग्रन्थ में इस अंश का विवेचन 'जानकी-स्तवराज' के नाम से किया है तथा इसे रामोपासना की परम्परा में रसिक-सम्प्रदाय का स्वतन्त्र एवं मान्य ग्रन्थ माना है। आचार्यजी ने उक्त ग्रन्थ में 'जानकी-स्तवराज' के जिस 49वें श्लोक को उद्धृत किया है, वह वर्तमान पाण्डुलिपि में 54वें श्लोक के रूप में उपलब्ध है। यद्यपि यहाँ भी इसे आगमशास्त्र के अन्तर्गत सम्मिलित करने का अथक प्रयास किया गया है और सम्पूर्ण स्तुति को श्रुति, संकर्षण के संवाद के रूप में योजित कर शिव के मुख से यह स्तुति करायी गयी है। इस स्तुति में सीता के पादादिकेशान्तवर्णन है। पादादिकेशान्तवर्णन के द्वारा स्तुति की परम्परा भक्ति- काव्यों में प्रसिद्ध रही है। आदि शंकराचार्य द्वारा विरचित विष्णुपादादिकेशान्त वर्णन प्रसिद्ध है। अतः इसे परवर्ती कवि की रचना मानना उचित होगा।