भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

पृष्ठ 48, कुल 337 में से

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पृष्ठ 48

(46) अगस्त्य-संहिता चौड़ाई एवं प्रकार का वर्णन है। जप की संख्या के आधार पर कुण्ड का परिमाण निर्धारित किया गया है। हवन के अन्य उपकरण जैसे स्रुव एवं स्रुक् के लक्षण, परिमाण एवं संक्षेप हवन में उसके अनुकल्प के रूप में पीपल का पत्ता बतलाया गया है। इसके बाद कुण्ड के वायुकोण में चावल के पीठा से अष्टदल-कमल का लेखन कर उसके विभिन्न दलों को विभिन्न वर्ण से बनाकर उसपर श्रीराम की अर्चना का विधान किया गया है। पुनः अग्निस्थापन की विधि अग्न्या carry on/अग्न्या न य न/अग्न्या न य न -> अग्न्या न य न, प्रोक्षण उपसारण, परिस्तरण आदि वर्णित है, किन्तु अपनी शाखा के गृह्यसूत्र में उल्लिखित विधियों का आलम्बन करने की अनुशंसा सर्वत्र की गयी है। अग्नि के संस्कार गर्भाधान से विवाह पर्यन्त कर के उस अग्नि में वैष्णव-चरु बनाने का वर्णन है। उस चरु से अंग सहित सीताराम को हवि समर्पित कर के विनायकादि अंग देवताओं को भी आहुति देने का विधान किया गया है। अन्त में ब्रह्म- दक्षिणा, मार्जन, ब्राह्मण भोजन, चरुप्राशन आदि क्रियाएँ भी उल्लिखित हैं। अध्याय के अन्त में एक महत्त्वपूर्ण निर्देश है कि नित्य, नैमित्तिक एवं काम्य तीनों प्रकार के कर्मों में हवन किया जाना चाहिए। पंचदशाध्याय इस अध्याय में श्रीराम की उपासना के क्रम में अनेक प्रकार के सकाम हवनों की विधि का वर्णन किया गया है। इसमें कामना भेद से हविष्य सामग्री में अन्तर बतलाया गया है। जैसे- बिल्व-पुष्प - ऐश्वर्य पलाश-पुष्प - मेधा, ज्ञान चन्दन के जल से सुगन्धित जूही फूल के साथ अक्षत मिलाकर हवन करने से राजवशीकरण सिद्ध होता है। दूर्वा या गुरुच के साथ अक्षत मिलाकर हवन करने से रोगनाश और दीर्घायु की बात कही गयी है। इस अध्याय में इस प्रकार के अनेक प्रयोग हैं, जिनसे वशीकरण, उत्तम स्त्री की प्राप्ति, जगद्वशीकरण, सुख, समृद्धि आदि की प्राप्ति होने की बात कही गयी है। अध्यायान्त में सिद्धान्त का प्रतिपादन किया गया है कि सकाम भाव से जो उपासना करते हैं, उन्हें उसी कामना की सिद्धि होती है, उन्हें मुक्ति नहीं मिलती; क्योंकि एक कर्म के दो फल नहीं हो सकते। फिर अन्त में निर्देश करते हैं कि श्रीराम का षडक्षर मन्त्र मुक्ति देनेवाला है। इसका प्रयोग मारणादि कर्म में नहीं करना चाहिए; क्योंकि विद्वान् तुच्छ खरगोश पर ब्रह्मास्त्र नहीं चलाया करते हैं।