भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

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पृष्ठ 49

प्रस्तावना (47)

षोडशाध्याय इस अध्याय में षडक्षर मन्त्र के पुरश्चरण की विधि का वर्णन किया गया है। इस मन्त्र के प्रतिदिन जप में छह हजार, एक हजार अथवा एक सौ आठ संख्या बतलायी गयी है। इस अध्याय के अनुसार पुरश्चरण के पाँच अंग हैं- पूजन, नित्य जप, तर्पण, होम एवं ब्राह्मण-भोजन। गुरु से प्राप्त मन्त्र की यह पंचागोपासना पुरश्चरण कहलाती है। इस अध्याय में पुरश्चरण कर्त्ता के लिए हविष्यान्न भोजन तथा वर्ज्य पदार्थों का उल्लेख है; पुरश्चरण किस स्थान पर किया जाना चाहिए, इसका भी वर्णन है। यहाँ सम्पूर्ण आचार-संहिता का उल्लेख किया गया है, किन्तु अन्त में प्रतिपादित किया गया है कि निष्काम भाव से इस पुरश्चरण को करने से ईश्वर के साथ साक्षात्कार होगा। गृहस्थों के लिए ब्राह्मण भोजन अनिवार्य बतलाया गया है, किन्तु अशक्त गृहस्थ एवं अन्य प्रकार के साधक भी जपसंख्या को द्विगुणित कर इसकी क्षतिपूर्ति कर सकते हैं। इसी प्रकार, हवन, पूजा अथवा तर्पण में भी अशक्त रहने पर उतनी संख्या में जप कर क्षतिपूर्ति कर सकते हैं। अन्त में, इस पुरश्चरण से भोग और मोक्ष दोनों की प्राप्ति कही गयी है।

सप्तदशाध्याय इस अध्याय में शिष्य की दीक्षा के अन्तर्गत अभिषेक की विधि का वर्णन है। इसके आरम्भ दीक्षा के लिए शुभ मुहूर्तों का विधान तथा अपनी शाखा के गृह्यसूक्त के अनुसार नान्दीमुख-श्राद्ध, स्वस्तिवाचन आदि का विधान किया है। सूर्यग्रहण के दिन किसी भी मुहूर्त को देखने की आवश्यकता नहीं है। शिष्य कलश की स्थापना कर ब्राह्मणों का वरण करें और वैदिक तथा पौराणिक मन्त्रों से सुन्दर सूक्तों को सुनते हुए विष्णु की पूजा करें। गुरु भी भूतशुद्धि, न्यास आदि के साथ विष्णु-पूजन कर रात्रि में जागरण, कथालाप आदि करते हुए छह हजार मन्त्र जप करते हुए रात्रि व्यतीत करें। दूसरे दिन पुनः भूतशुद्धि, न्यास, पूजन, जप आदि सम्पन्न कर हवन करें। पूर्णाहुति के बाद शिष्य को प्राणायाम कराकर सुरास्त्वां० इत्यादि मन्त्र से कलश के जल से अभिषेक करावें। तब शिष्य को नवीन वस्त्र, चन्दन, आभूषण आदि से सज्जित कर षडंगन्यास करें। फिर शिष्य के मस्तक पर हाथ रखकर 108 बार मन्त्र का जप करें। तब गुरु हाथ में जल लेकर उसे शिष्य के हाथों में डाले और मन्त्र दें। शिष्य को विभवानुसार गुरु एवं उनके पुत्र, पत्नी आदि को वस्त्र, आभूषण भोजन आदि देना चाहिए। गुरु को प्रसन्न कर उन्हें विदा कर शिष्य स्वयं भोजन करे और अपने परिजनों को भोजन कराये। उसके बाद प्रतिदिन शिष्य प्रातः, मध्याह्न एवं सन्ध्या में जप करे।