भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

पृष्ठ 54, कुल 337 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 54

(52) अगस्त्य-संहिता

बाँधकर एक मुहूर्त के आधे समय अर्थात् 24 मिनट तक स्थिर रहकर मुख खोलें। आगे के चरण में इस रुद्ध वायु से एक एक कर ग्रन्थियों का भेदन करें। भूमध्य में स्थित द्विदत्त कमल से अमृत की टपकती हुई धारा का पान कर उसी धारा में समस्त असत् को प्रवाहित कर साधक अमर हो जाता है। जब पाँचवीं ग्रन्थि का भी भेदन सम्पन्न हो जाता है, तब शब्दब्रह्म से साक्षात्कार होने पर सर्वज्ञता आ जाती है। आगे मूलाधार में स्थित वायु को सुषुम्णा नाडी के द्वारा ब्रह्मरन्ध्र में प्रवेश करायें। इससे यह जन्म सफल हो जाता है और मुक्ति मिल जाती है। हे योगीन्द्र सुतीक्ष्ण! यह सब संन्यास से होता है। यहीं मुक्ति का मार्ग है, जो सभी दर्शनों में कहा गया है। श्रीराम सत्य हैं, परब्रह्म हैं, राम से ऊपर कुछ भी नहीं है। यह रहस्य अगस्त्य-संहित में कही गयी है। यह 'अगस्त्य-संहिता' अध्यात्म मार्ग की दीपशिखा है। जिसके घर में यह पुस्तक पूजित है, वे सद्यः अभीष्ट फल प्राप्त करते हैं, आयु, आरोग्य, ऐश्वर्य, पुत्र-पौत्र प्रपौत्र आदि की वृद्धि होती है। चतुर्विंशाध्याय अध्याय के आरम्भ में अगस्त्य-संहिता में उक्त मार्ग को परम मार्ग मानते हुए श्रीराम के माहात्म्य का वर्णन है। श्रीराम परम ज्योतिःस्वरूप हैं, इस संसार के विस्तार की आत्मा हैं। वसिष्ठ, वामदेव, नारद आदि ऋषियों ने वेद, स्मृति, पुराण आदि का अवलोकन कर यह निश्चय किया है कि श्रीराम यज्ञ स्वरूप हैं, जिससे स्थावर और जंगम प्राणियों की उत्पत्ति हुई है। श्रीराम के मन्त्र शब्द प्रकाश स्वरूप है और श्रीराम से ही इसकी भी उत्पत्ति हुई है, अतः इन मन्त्रों के जप से भोग और मोक्ष दोनों मिल जाते हैं। इस अध्याय में श्रीराम के अनेक मन्त्रों का निर्देश किया गया है। जिनमें एकाक्षर मन्त्र 'राम्', द्व्यक्षर मन्त्र 'राम', षडक्षर मन्त्र ॐ रामाय नमः, क्लीं रामाय नमः, ह्रीं रामाय नमः आदि विवेचित हैं। आगे 'राम' पद के साथ 'चन्द्र' एवं 'भद्र' जोड़कर भी ह्रीं, श्रीं, क्लीं ॐ ये बीज पर्याय से लगाकर अनेक प्रकार के मन्त्र होते हैं। इन मन्त्रों के ऋषि, ब्रह्मा, शिव और अगस्त्य हैं, छन्द गायत्री है, देवता श्रीराम हैं, आदि और अन्त के बीज शक्तियाँ हैं तथा भोग और मोक्ष प्रयोजन हैं। इन मन्त्रों में से किसी एक का न्यास सभी अंगों में करना चाहिए। इसके बाद हृदय रूपी कमल के समान आँखोंवाले परात्पर पुरुष श्रीराम का ध्यान कर मानस-पूजा कर एकान्त में जप करें। श्रीसीताराम की विलासमयी युगलमूर्ति का ध्यान कर साधक भोग और मोक्ष पाते हैं। आगे जप, होम, अर्चना आदि