अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रस्तावना (53) करें। श्रीराम के मन्त्र उन्हीं के स्वरूप हैं, जिनका स्मरण और कीर्तन करने से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र, सभी पापमुक्त हो जाते हैं। इसलिए सद्गुरु के उपदेश से मण्डल में श्रीराम के मन्त्र का अनुष्ठान करने से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। पंचविंशाध्याय इस अध्याय में षडक्षर मन्त्र के अतिरिक्त जो श्रीराम के मन्त्र हैं, उनके अनुष्ठान की विधि बतलायी गयी है। इस अध्याय में सर्वप्रथम पूजा-विधानों एवं जपविधानों का त्याग कर भक्तिभाव से श्रीहरि के समक्ष कीर्तन, भजन, नामोच्चारण आदि करके भी मुक्ति प्राप्त करने की बात कही गयी है। ऐसे भक्तों के लिए दीक्षा और अन्य विधानों की व्यर्थता कही गयी है। बाद में कहा गया है कि सभी मन्त्रों में षडक्षर मन्त्र श्रेष्ठ है, अतः अन्य मन्त्रों के भी मूल विधान षडक्षर मन्त्र के समान है। दीक्षा-विधि में भी कोई अन्तर नहीं है। पुरश्चर्या विधि की पूर्वोक्त ही है। इस अध्याय में सूर्यमण्डल के मध्य में स्थित श्रीराम सीता एवं हनुमान् का ध्यान किया गया है। बाह्यपूजा की विधि यहाँ संक्षेप में वर्णित है। यहाँ देवता को अर्घ्य नैवेद्यों का उल्लेख किया गया है। षड्विंशाध्याय इस अध्याय में रामनवमी व्रत का विस्तृत विवरण दिया गया है। चैत्र शुक्ल नवमी के दिन पुनर्वसु नक्षत्र में कर्क लग्न में परमपुरुष श्रीराम कौशल्या के गर्भ से उत्पन्न हुए। इस उपलक्ष्य में इस दिन उपवास, व्रत, रात्रि-जागरण करना चाहिए तथा दूसरे दिन प्रातःकाल में दशमी तिथि में श्रीराम की पूजा कर ब्राह्मण- भोजन कराना चाहिए। गाय, भूमि, तिल, सोना आदि दान करना चाहिए। आगे श्रीराम की प्रतिमा की पूजा कर दान करने का विधान किया गया है। रामनवमी से एक दिन पूर्व स्नानादि क्रिया कर श्रीराम के मन्त्र के साधक का विधिपूर्वक वरण कर उन्हें आचार्य बनायें। फिर उन्हें स्नानादि कराकर नवीन वस्त्र पहनाकर स्वयं भी श्वेत वस्त्रादि धारण कर आचार्य के मुख से रामकथा सुनते हुए रात्रि में भूमि पर सोकर दूसरे दिन वेदी निर्माण कर अन्य विद्वानों के मुख से स्वस्तिवाचन सुनते हुए उसी स्वर्णमयी प्रतिमा का पूजन करें तथा अन्त में संकल्पपूर्वक उसके दान का संकल्प करें। आगे पूजन में प्रयुक्त चन्दन, कुंकुम आदि के निर्माण की विधि वर्णित है। इस दिन नृत्य, उत्सव भजन-कीर्तन आदि करते हुए दिन-रात व्यतीत करें। अगले दिन श्रीराम की विधिवत् पूजा कर