भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

पृष्ठ 56, कुल 337 में से

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पृष्ठ 56

(54) अगस्त्य-संहिता मूलमन्त्र से एक सौ आठ बार पायस से हवन करें। तब आचार्य को सन्तुष्ट कर संकल्प लेकर वह स्वर्णप्रतिमा दान करें। तब दक्षिणा देकर आचार्य और ब्राह्मणों को भोजन कराकर स्वयं भी भोजन करें। इससे अनेक जन्मों के पाप मिट जाते हैं और तुलापुरुष आदि दान का फल मिलता है। सप्तविंशाध्याय रामनवमी के दिन प्रतिमा-दान से भिन्न कल्प का विधान किया गया है। आरम्भ में पूर्व अध्याय का अनुकल्प है कि स्वर्ण प्रतिमा के दान करने में यदि आर्थिक कठिनाई हो, तो एक पल के सोलहवें भाग के बराबर सुवर्ण की प्रतिमा दान की जा सकती है। दूसरा कल्प है कि नवमी के दिन व्रत कर रात्रि में जागरण कर भक्तिपूर्वक श्रीराम का पूजन करें। दशमी तिथि को गाय, भूमि, तिल, हिरण्य आदि वित्त के अनुसार दान करें। इस प्रकार जो रामनवमी का व्रत करते हैं, वे सभी पापों से मुक्त हो जाते हैं। यह रामनवमी का व्रत नित्यकर्म है। अर्थात्, जो यह व्रत नहीं करते, वे पाप के भागी होते हैं। आगे इस अध्याय में कहा गया है कि दशम अध्याय में वर्णित विधि से षोडशोपचार से विधिपूर्वक पूजन करें। इस दिन मौन व्रत धारण कर एकान्त में रहते हुए श्रीराम-मन्त्र का जप उस पाप को नष्ट कर देता है, जो पाप बारह वर्षों में भी नष्ट नहीं होता। रामनवमी के दिन प्रत्येक प्रहर में पूजा करनी चाहिए। अष्टाविंशाध्याय इस अध्याय में भी रामनवमी व्रत और उस दिन पूजन का माहात्म्य बतलाया गया है। इस दिन उपवास, जागरण, पितृ-तर्पण करना चाहिए। जो रामनवमी के दिन पितरों के निमित्तं तर्पण करते हैं, उनके पितर उसी क्षण विष्णु के परमधाम को चले जाते हैं। इस दिन व्रत करने से तुलापुरुष दान का फल मिलता है। रामनवमी का निर्णय करते हुए कहा गया है कि अष्टमीविद्धा नवमी का त्याग वैष्णवों को करना चाहिए। नवमी में व्रत कर दशमी में पारणा करें। इसी अध्याय में आगे सुतीक्ष्ण द्वारा पूछे जाने पर तत्त्व, जाप्य मन्त्र एवं ध्यान का विस्तृत विवेचन किया गया है। यहाँ त्रिगुणातीत, निर्मल ज्योतिःस्वरूप को तत्त्व मानकर 'श्रीराम' को परम जाप्य मन्त्र माना गया है। 'श्रीराम, राम, राम' का जप जो करते हैं, वे भोग और मोक्ष दोनों प्राप्त करते हैं। इसके बाद श्रीराम का ध्यान बतलाया गया है कि अयोध्या नगर में रत्नमण्डप पर कल्पतरु