भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

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पृष्ठ 57

(55) की जड़ में रत्न सिंहासन पर आसीन श्रीराम का ध्यान करें। यहाँ अष्टदल कमल पर विभिन्न दलों में अंग, परिजन और परिवार देवताओं की स्थिति का वर्णन कर षोडशोपचार-पूजन का विवरण दिया गया है। यहाँ उल्लेख है कि प्रत्येक मास शुक्लपक्ष की नवमी तिथि को पौराणिक स्तोत्रों एवं वेदपाठ के साथ श्रीराम की पूजा करनी चाहिए। एकोनत्रिंशाध्याय इस अध्याय के आरम्भ में न्यास को मन्त्र का कवच कहते हुए जप से पूर्व न्यास का अनिवार्य विधान किया गया है कि केशवकीर्त्यादि-न्यास, तत्त्वन्यास, परमहंसन्यास, प्रणवन्यास, मातृकान्यास आभ्यन्तरमातृकान्यास क्रमशः कर मन्त्र का जप करें। यदि इन न्यासों को करने में अशक्त हों, तो केवल मन्त्र का भी जप किया जा सकता है। इस अध्याय में आगे श्रीराम के मन्दिर में प्रतिष्ठा के लिए शुभ दिन की गणना की गयी है। चैत्र शुक्ल नवमी को चन्द्र, तारा आदि का बलाबल देखे बिना श्रीराम की प्रतिष्ठा करनी चाहिए। अथवा माघ शुक्ल नवमी को चन्द्रमा और तारा शुभ होने पर करें। मार्गशीर्ष अथवा वैशाख की पूर्णिमा के दिन भी मूल आदि दोष न होने पर प्रतिष्ठा करें। गोपाल कृष्ण की स्थापना के लिए श्रावण, नृसिंह और केशव की प्रतिमा-स्थापन के लिए वैशाख एवं राम के लिए चैत्र प्रशस्त मास है। भगवान् अनन्त की प्रतिमा भी माघ में स्थापित करें। मन्दिर की वास्तु का विधान किया गया है कि मन्दिर के स्थान से काँटा, ईंट, पत्थर आदि हटाकर वहाँ तबतक खोदें जबतक जल छूटने लगे। फिर पत्थर और बालू से भरकर उस स्थान को दृढ़ कर पत्थर कूटकर ठोंक पीट कर दो हाथ ऊँचा चबूतरा (भूमिका) बनावें। इसपर सुन्दर देवालय का निर्माण करें। इसके चारों ओर गोपुर से युक्त प्राकार का निर्माण करावें। मन्दिर के गर्भगृह में दो हाथ की चौकोर वेदी बनाकर पीठ के आगे हनुमान्, अग्निकोण में सुग्रीव, दक्षिण में भरत, नैर्ऋत्य में विभीषण, उत्तर में शत्रुघ्न और ईशान कोण में जाम्बवान् का अंकन करें एवं बीच में श्रीराम का अंकन करें। इस यन्त्र का अंकुरारोपण आदि कर प्रतिष्ठापन करें और कुटुम्बवाले दरिद्र ब्राह्मण को यह मन्दिर दान करें। त्रिंशाध्याय इस अध्याय में दशाक्षर आदि मन्त्र का विधान किया गया है। तथा प्रत्येक मन्त्र के लिए अलग-अलग ध्यान बतलाये गये हैं। आगे लक्ष्मण भरत, शत्रुघ्न, हनुमान् इन अंग देवताओं के मालामन्त्र का विधान किया गया है। अन्त