अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअगस्त्य-संहिता श्रीरामो जयति। १ अगस्त्यो नाम विप्रर्षिः सत्तमो गौतमीतटे। कदाचिद्दण्डकारण्यं सुतीक्ष्णस्याश्रमं ययौ।।१।। अगस्त्य नाम के श्रेष्ठ ब्रह्मर्षि किसी समय में दण्डकारण्य में गौतमी नदी के तट पर स्थित सुतीक्ष्ण मुनि के आश्रम पर पहुँचे। प्रत्युज्जगाम तं भक्त्या गन्धपुष्पाक्षतोदकैः। पाद्यार्घ्याद्यर्हणां चक्रे तस्मै ब्रह्मविदे मुनिः।।२। सुतीक्ष्णस्तं प्रणम्याह² सुखासीनं तपोनिधिम्। श्रीमदागमनेनैव जीवितं सफलं मम।।३।। अद्य जन्मसहस्रेषु तपः फलति संचितम्। मुनि सुतीक्ष्ण ने उनकी आगवानी की और चन्दन, पुष्प, अक्षत, जल, हाथ-पैर धोने का जल देकर उस ब्रह्मवेत्ता मुनि का पूजन किया। जब वे सुखपूर्वक आसन पर बैठ गये, तब सुतीक्ष्ण मुनि ने कहा कि श्रीमान् के आगमन से ही मेरा जीवन सफल हो गया। आज सैकड़ों जन्मों की तपस्या का फल मुझे मिल गया। कामक्रोधादिभिर्भूयो भूयोऽहं पीडितो मुने।।४।। नाद्राक्षं सम्यगिष्ट्वापि क्रतुभिर्बहुदक्षिणैः। ३ सत्पात्रे सर्वदानानि दत्वा तु मुनिसत्तम।।५।। भवाब्धेस्तरणोपायं तपस्तप्त्वा सुदुष्करम्। किं करिष्याम्यहं तात क्व यास्यामीति तद्वद।।६।। हे महामुनि! मैं काम क्रोध आदि से अत्यन्त पीड़ित हूँ। मैंने कई यज्ञ किये, जिनमें पर्याप्त दक्षिणा दी, सत्पात्र को दान किया, किन्तु संसार को पार लगाने का
- क. श्रीमते रामानुजाय नमः। ख. श्री गणेशाय नमः। 2. ख. मुनिं प्राह। 3.ख. ºभूरिदक्षिणैः।