भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

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पृष्ठ 63

(2) ————————— अगस्त्य-संहिता ————————— उपाय मैंने नहीं देखा। कठिन तपस्या भी की; किन्तु अब मैं क्या करूँ? कहाँ जाऊँ? इसका उपदेश करें। इत्युक्तः सोऽब्रवीत्तेन कुम्भभूर्विगतस्पृहः।¹ क्षणं विचार्य तत्पौर्वापर्य्येण मुनिपुङ्गवः॥7॥ ऐसा कहने पर वीतराग महामुनि अगस्त्य ने कुछ देर सोचकर बारी बारी से सुतीक्ष्ण को कहने लगे। अगस्त्य उवाच अस्ति वक्ष्यामि ते सर्वं रहस्यं वृषभध्वजः। यत्प्रत्यपादयत्पूर्वं ² पार्वत्यै कृपयात्मवित्॥8॥ अगस्त्य बोले – 'इसका भी उपाय है। प्राचीन काल में आत्मज्ञानी भगवान् शिव ने प्रेमपूर्वक पार्वती से जो रहस्य कहा था, वहीं मैं तुमसे कह रहा हूँ। ³कदाचित् पार्वती प्राह भर्तारं भक्तवत्सलम्। कथं मे देव निस्तारो भवाब्धेस्तरणं भवेत्॥9॥ भवाब्धौ मोहिताः सर्वे सद्गतिं प्राप्नुवन्ति ते। किसी समय में पार्वती ने भक्तवत्सल भगवान् शंकर से पूछा – हे देव! मुझे मुक्ति कैसे प्राप्त होगी और संसार से कैसे पार लगेगा? इस संसार रूपी समुद्र में मोह-ग्रस्त होकर कैसे सभी सद्गति को प्राप्त कर सकेंगे? ईश्वर उवाच कामक्रोधादिभिर्दोषैर्दुष्टास्तत्र पुनः पुनः। उत्पद्यन्ते विलीयन्ते⁴ पुनर्व्यामोहितास्त्वया॥10॥ ईश्वर बोले – काम, क्रोध आदि दोषों से इस संसार में लोग आपके द्वारा माया से मोहित होकर बार-बार उत्पन्न और विलीन होते देखे जाते हैं। रौरवादिषु पच्यन्ते पुनः संसारिणो भुवि। कर्मशेषात् प्रजायन्ते पंग्वन्धबधिरादयः॥11॥ वे पृथ्‍वी पर उत्पन्न होकर रौरव आदि नाम के नरकों में पचते हैं और पुण्य कर्म के क्षीण होने से लँगडे, अन्धे, बहरे आदि हो जाते हैं।

  1. क. बभूव विगतस्पृहः। 2. क. प्रीत्योत्पादयत्पूर्वं। 3. घ. यहाँ से छह चरण अनुपलब्ध। 4. घ. प्रलीयन्ते।