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अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

पृष्ठ 64, कुल 337 में से

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पृष्ठ 64

प्रथमोऽध्यायः (3) कृमिकीटादयो भूत्वा पुनः संसारिणो भुवि। कुष्ठाद्युपहताः¹ केचिच्चौरव्याघ्रादिभिर्हताः ।।12।। फिर पृथ्वी पर कीड़े-मकोड़े के रूप में जन्म लेकर ये संसारी कुष्ठ आदि रोगों से जकड़े हुए तथा कुछ चोर-डाकू, बाघ आदि के द्वारा मार डाले जाते हैं। प्रविशन्ति जलेऽग्नौ वा देशाद् देशं व्रजन्ति हि। परस्त्रीधनहन्तारस्तापयन्ति सतः सदा ।।13।। जो लोग दूसरे की स्त्री अथवा धन का हरण करते हैं और सज्जनों को सताते हैं; वे पानी मे डूबते हैं, आग में झुलसते हैं अथवा इस स्थान से उस स्थान भटकते रहते हैं। देवब्राह्मणवित्तैस्तु येषां जीवनमन्वहम्। राजसाः तामसाश्चैव हर्तारो धनजीविनः ।।14।। पुत्रदारादिभिर्युक्ता दुःखवर्ते भ्रमन्त्यहो। जो देवता, ब्राह्मण और पुरोहितों के धन से जिनका जीवन चलता है, ऐसे राजस और तामस स्वभाव के लोग पुत्र, पत्नी आदि से युक्त होकर इस दुःख के भँवर में घूमते रहते हैं। ²कलौ प्रायेण सर्वेऽपि राजसा तामसास्तथा ।।15।। निसिद्धाचारिणः सन्तो मोहयन्त्यपरान्बहून्। यथाभूतः प्रभुल्लोके सेवकाः स्युस्तथाविधाः ।।16।। अतो मदीयाः सर्वेऽपि हिंसकाःस्वप्रियाः प्रिये। वश्याकर्षणविद्वेषस्तम्भनोच्चाटनादिषु ।।17।। शश्वदावां समाराध्य भवन्ति फलभागिनः। आवाभ्यां पिशितं रक्तं सुरां चापि सुरेश्वरि ।।18।। वर्णाश्रमोचितो धर्ममविचार्य्यार्पयन्ति ये। भूतप्रेतपिशाचास्ते भवन्ति ब्रह्मराक्षसाः ।।19।। कलियुग में प्रायः सभी राजस या तामस प्रवृत्ति के लोग होते हैं। निषिद्ध कर्म करनेवाले हैं और वे बहुत से दूसरे लोगों को कष्ट देते हैं। संसार में जैसा मालिक होता है, वैसे ही सेवक भी होते हैं। इसलिए हे प्रिये! वे सभी हिंसक मेरे

  1. घ. केचिच्छस्त्रहताः। 2. क. एवं ख. में पंक्ति के क्रम में अन्तर है ।
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