भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

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पृष्ठ 65

(4) अगस्त्य-संहिता प्रिय हैं। वशीकरण, आकर्षण, विद्वेषण, स्तम्भन, उच्चाटन आदि प्रयोगों में लीन रहनेवाले वे नित्य हम दोनों की आराधना करके फल पाते हैं। हमदोनों को तो मांस, रक्त, सुरा भी समर्पित करते हैं, किन्तु हे सुरेश्वरि! वर्ण और आश्रम के लिए विहित धर्म का विचार किए विना जो हमदोनों को मांस, रक्त, मदिरा अर्पित करते हैं, वे भूत, प्रेत, पिशाच और ब्रह्मराक्षस होते हैं। पुनस्तदन्ते जायन्ते विप्रदेवाधिकारिणः। तत्तद्रूपेण जायन्ते स्वस्वदोषानुरूपतः।।20।। और फिर मृत्यु पाकर पुरोहित और मन्दिर के अधिकारी होते हैं, फिर अपने दोषों के अनुसार भूत, प्रेत, पिशाच आदि के रूप में जन्म लेते हैं। पार्वत्युवाच नायं धर्मो हि देवेश परेषामुपकारकृत्। अतो मे ब्रूहि देवेश धर्मो यस्त्वं कृपानिधे।।21।। पार्वती बोली- हे देवाधिदेव, हे करुणानिधि! यह वशीकरण आदि धर्म दूसरे का उपकार करनेवाला नहीं हैं, अतः जो धर्म है, वह मुझे बतलाइए। ईश्वर उवाच सत्यं वदाम्यहं देवि यन्मां त्वं परिपृच्छसि। हन्ताहं सर्वलोकानां यतो हिंसैव मे प्रिया।।22।। महादेव बोले- हे देवि! मैं ठीक ही तो कहता हूँ, जो तुम मुझे पूछ रही हो। मैं तो सभी लोकों का अन्तक हूँ; अतः हिंसा मुझे प्रिय हैं। ये वा भूतानि निघ्नन्ति विधिनाविधिनापि वा। समर्पयन्ति भूतेभ्यो मत्प्रियास्ते सदा प्रिये¹।।23।। जो प्राणियों का वध विधानपूर्वक या विना विधान के भी करते हैं और भूत-प्रेतों को समर्पित करते हैं वे सदा मेरे प्रिय हैं। अहं तमोमयो नित्यं हन्मि भूतानि भामिनि। मत्कर्म हननं नित्यमतो हिंसैव मे प्रिया।।24।। हे भामिनि! मैं नित्य तमोमय हूँ और प्राणियों का संहार करता हूँ। संहार करना मेरा कर्म है, अतः हिंसा ही मेरा प्रिय है।


  1. घ. मत्प्रियाः सर्व्वदा प्रिये।