अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ
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प्रथमोऽध्यायः (5) मत्कृत्याचारिणः सर्वे वल्लभा मम वल्लभे। लोके स्वाम्यनुकल्पेन सेवां कुर्वन्ति सेवकाः।।२५।। भक्त्यार्पयन्ति ये मह्यं तवापि पिशितादिकम्। उत्पादयन्ति चानन्दं गणेभ्यो वा सुरप्रिये।।२६।। हे स्वामिनि! प्रिये! जो कार्य मैं करता हूँ, उन कार्यों को करनेवाले सभी मेरे प्रिय हैं। इस संसार में स्वामी के समान ही सेवक भी सेवा करते हैं। हे देवप्रिये पार्वति! मुझे या तुम्हें जो भी व्यक्ति भक्तिपूर्वक मांस आदि अर्पित करते हैं उससे हमें या हमारे गणों भूत-प्रेत पिशाच आदि को प्रसन्नता होती है। तवापि च मदीयानामस्माकं पिशितादिकम्। तृप्तिमुत्पादयन्त्येव विधिनाविधिनार्पितम् ।।२७।। तुम्हें और मुझे दोनों को विधिपूर्वक या विना विधि के भी अर्पित किये गये मांस आदि संतुष्टि तो देते ही हैं। ब्रह्मा सृजति भूतानि विष्णुः तान्परिपालयेत्।¹ तान्यहं हन्मि भूतानि कृतिरस्भाकमीदृशी ।।२८।। ब्रह्मा प्राणियों की सृष्टि करते हैं, विष्णु उनका पालन करते हैं और मैं उनका संहार करता हूँ। हमलोगों के तो ये ही कार्य हैं। रजोगुणालयो ब्रह्मा विष्णुः सत्त्वगुणालयः। तमोगुणालयोऽहं स्यां स्वस्वकार्याणि कुर्महे।।२९।। ब्रह्मा में रजोगुण का निवास है, विष्णु सत्त्वगुण के आलय हैं और तमोगुण का आलय मैं हूँ। हमसब अपने अपने कार्य करते हैं। तत्तद्गुणानुगुण्येन क्रियतेस्माभिरीदृशम्। उन उन गुणों के अनुरूप हमसब इस प्रकार कार्य करते हैं। भवाब्धेस्तरणं देवि हिंसकानान्तु दुर्लभम्।।३०।। कामादिग्रस्तचित्तानां कुतो मुक्तिर्वद प्रिये।।३१।। हे प्रिये! लेकिन इस संसार रूपी सागर को पार करना हिंसकों के लिए दुर्लभ है। काम आदि से ग्रस्त लोगों के लिए मुक्ति कैसे होगी यह कहो। इत्यगस्त्यसंहितायां शिवपार्वत्युपाख्यानम् नाम प्रथमोऽध्यायः ।।१।।
- घ. विष्णुस्तान्येव पाति वै।