अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 67, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ें(6) अगस्त्य-संहिता अथ द्वितीयोऽध्यायः पार्वत्युवाच। कमुपास्य लभेन्मुक्तिं क्रियया च कया प्रभो। मुमुक्षोः पुनरावृत्तिदुर्लताभयभञ्जन¹।।1।। हे शंकर! मोक्षार्थियों के लिए पुनर्जन्मरूपी दुष्टलता के भय का नाश करनेवाले! हे प्रभो! हे संसार का संहार करनेवाले! किस देवता की उपासना और कैसा कर्म करने से मुक्ति मिलेगी? ईश्वर उवाच शृणु देवि महाभागे रहस्यं कथयाम्यहम्। यज्ज्ञात्वा मुच्यते जन्तुर्जन्मसंसारबन्धनात्।।2।। ईश्वर बोले- हे देवि, मैं उस रहस्य को बतला रहा हूँ, जिसे जान लेने पर प्राणी संसार के बन्धन से मुक्त हो जाता है। अपाणिपादो जवनो ग्रहीतापीक्ष्यतेऽप्यदृक्। अकर्णः स शृणोत्येतच्छब्दरूपं² परं महः।।3।। वेत्ति वेद्यं स सर्वज्ञानवेद्यो विद्यते प्रभुः।³ स महापुरुषः पुंसां स्त्रीणां पुंव्यक्तिलक्षणः ।।4।। वे महापुरुष परमेश्वर विना पैर के भी गतिशील हैं, विना हाथ के भी ग्रहण करने में समर्थ हैं, विना आँख देखते हैं और विना कान के सुनते हैं और शब्द के रूप में महान् हैं। वे सभी ज्ञातव्य विषयों को जानते हैं और वे प्रभु समग्र ज्ञान के द्वारा ज्ञेय हैं। पुरुषों में महापुरुष और स्त्रियों में पुरुष स्वरूप हैं। स्त्रीपुन्नपुंसकाकाररहितः पुरुषोत्तमः। सर्वेश्वरः सर्वरूप सर्वदेवमयो हरिः।।5।। स्त्री, पुरुष और नपुंसक के आकार से रहित निराकार पुरुषोत्तम हरि सबके स्वामी हैं, सभी रूपों में हैं तथा सभी देवताओं के रूप में हैं। सत्त्वज्ञानमयोऽनन्तोऽनादिरानन्द उच्यते। अजः स्मरणमात्रेण जन्मादिक्लेशभञ्जनः।।6।। तस्यात्मधीश्र्च सर्वेषां पुनरावृत्तिकर्त्तनी।
- क. एवं ख. पुरावृत्तिं दुर्लभां भवभञ्जक। 2. घ. छन्दोरूपे। 3. घ. वित्ति वेद्यं स सर्वज्ञो नावेद्यं विद्यते प्रभोः।