अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 68, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयोऽध्यायः (7) सत्त्व-स्वरूप, ज्ञान-स्वरूप, अनन्त, अनादि, आनन्दमय तथा अजन्मा कहे जाते हैं तथा केवल स्मरण करने से जन्म आदि के कारण उत्पन्न कष्ट को दूर करते हैं। उनमें जो ध्यान लगाते हैं उनकी बुद्धि इस संसार में पुनर्जन्म को काटनेवाली कैंची बन जाती है। नियमेनैव वर्णानां स्वाश्रमोक्तेन स प्रभुः ।। 7 ।। ध्येयः संसारनाशाय १ न चैवावर्तते पुनः । सभी वर्णों के अपने अपने आश्रमों के अनुरूप बने नियमों के अनुरूप ध्यान किये गये वे प्रभु पुनः संसार में जन्मग्रहण के नाशक हैं। वह भक्त इस संसार में पुनः उत्पन्न नहीं होता। स्वाश्रमोक्तं परित्यज्य य आत्मानमुपासते ।। 8 ।। तद्रूपेण ततो देवि मुच्यते भवबन्धनात्। हे देवि! अपने आश्रम के लिए कथित विधान को छोड़कर अर्थात् संन्यास लेकर जो आत्मा की उपासना करते हैं, वे उसी रूप में इस संसार के बन्धन से मुक्त हो जाते हैं। श्रुतिस्मृतिपुराणेषु यो यो नियम उच्यते ।। 9 ।। यस्य यस्याश्रमन्वायो न मोक्तव्यो मुमुक्षुभिः । अतो नियममादृत्य कुर्याद् ध्यानमनन्यधीः ।। 10 ।। वेद, स्मृति एवं पुराणों में जो जो नियम बतलाये गये हैं तथा जिसका जो आश्रम है, उस आश्रम के अनुरूप जो नियम बनाये हैं, मोक्षार्थियों को उन नियमों का त्याग नहीं करना चाहिए। नियमों के अनुसार एकचित्त होकर प्रभु का ध्यान करें। एतच्चराचरं विश्वं स्वप्नप्रत्ययवत्सुधीः । मिथ्यादृग्व्यतिरिक्तं यद् दृश्यतेद्धा तथा प्रिये ।। 11 ।। दृग्रूपेणात्मना ज्ञानं सत्यानन्दात्मनः स्वयम्। एकाकी जितचित्तात्मा चिन्तयेत् तदनन्यधीः ।। 12 ।। सोऽहमित्यात्मनात्मानं त्वाज्ञानपरिकल्पितम्। एतत् स्वव्यतिरिक्तं यद्यतः स्वेनैव कल्पते ।। 13 ।। न पारमार्थिकं देवि यद्यद् बालो हि कल्पयेत् ।। बालाज्ञयोर्वा को भेदः कल्पेते न तु चक्षुषा ।। 14 ।।
- क. संसृतिनाशाय।