अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 69, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ें(8) अगस्त्य-संहिता विद्वान् इस चराचर जगत् को स्वप्न के ज्ञान के समान मानते हैं। यह संसार दिखाई पड़ता है, अतः मिथ्या है। कुछलोग इसे मिथ्यादृष्टि से भिन्न अर्थात् वास्तविक मानते हैं। आत्मदृष्टि से ज्ञान को सत्य रूप और आनन्द स्वरूप समझते हुए स्वयं साधक एकाकी होकर चित्त और आत्मा को जीतकर उस ज्ञानमय ब्रह्म का चिन्तन करे कि 'वह ब्रह्म मैं हूँ '(सोऽहम्)। किन्तु मनुष्य अपनी अज्ञानता के कारण इस संसार को स्वप्न से भिन्न वास्तविक मानता है और उसी के अनुसार चलता है। बच्चे जो जो कल्पना करते हैं, वे परम तत्त्व (वास्तविक) नहीं हैं, तब बच्चे और अज्ञानियों में भेद भी कहाँ है? वे दोनों तत्त्वचक्षु से अवधारण नहीं करते हैं। ¹अयं पन्थाः पुराणः स्यादनुप्राप्तः पुरातनः। अध्यात्मविद्भिरर्चितो ज्ञापितः स परः स्मृतः।।15।। ब्रह्मज्ञान का यह प्राचीन मार्ग है, जो परम्परा से परम्परा के द्वारा प्राप्त है। अध्यात्मज्ञानियों ने देवता की अर्चना के द्वारा इसे लोगों को समझाया है, अतः वह परम तत्त्व है। आब्रह्मशुद्धवंश्यानां मातापित्रोः कुले च ये। स्त्रियो वाऽव्यभिचारिण्यः पुरुषाश्चैव धार्मिकाः।।16।। जो ब्रह्म से लेकर शुद्ध वंशवाले कुल में उत्पन्न माता-पिता से उत्पन्न पुरुष हैं तथा पतिव्रता स्त्रियाँ हैं, वे धार्मिक हैं। यज्ञाश्च वेदाध्ययनमेधेते प्रतिपूरुषम्। पूज्यन्तेऽतिथयो यत्र गुरुशिष्यपरम्परा।।17।। स्वप्नेऽपि चलनं नैव² स्त्रीष्वपि ब्रह्मचारिषु। नियमोऽप्याश्रमस्थेषु कदाचिदपि भामिनि³।।18।। यज्ञ और वेद का अध्ययन ये दोनों प्रति व्यक्ति में वृद्धि प्राप्त करते हैं। जहाँ गुरु-शिष्य की परम्परा और अतिथियों की पूजा होती है। उन आश्रमों में स्थित स्त्रियों और ब्रह्मचारियों के नियमों में स्वप्न में भी विचलन नहीं होता।
- क. यहाँ से छह चरण अनुपलब्ध। 2. घ. स्वल्पोऽपि स्खलते नैव। 3. घ. कदाचिन्न विमुच्यते।