अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयोऽध्यायः (9) तत्तत्कालेषु¹ दानं हि तदर्थिभ्यः प्रदीयते। येषु वंशेषु सर्वेषां तेषामेव प्रकाशते।।19।। ब्रह्म ब्रह्मविदा देवि गुरुशिष्योक्तिशिक्षया। हे देवि! गुरु और शिष्य द्वारा किए गये उपदेश से जिन वंशों में विहित अवसरों पर प्रार्थियों को दान किए जाते हैं उन वंशों के ब्रह्मज्ञानी के द्वारा ब्रह्म प्रकाशित होते हैं। अयमेव परं ब्रह्म नान्यत्किञ्चिन्न विद्यते।।20।। इदमेव परं ब्रह्म ततोऽन्यं नास्ति किंचन। तदेतदखिलं ब्रह्म सत्यं सत्यं प्रकाशते।।21।। एक परम ब्रह्म स्वयं है, इससे अतिरिक्त कुछ भी नहीं है, यह समग्र ब्रह्माण्ड सत्य स्वरूप है, जो निश्चय ही प्रकाशवान् है। जन्मकोटिसहस्रेषु प्रक्षीणाशेषदुष्कृतैः। कैश्चिदेव नियम्यासूनपरोक्षं निरीक्ष्यते।।22।। सुखामृतरसास्वादसत्यज्ञानैकरूपता । भागाश्रयेण विदुषा स्वयमेवानुभूयते।।23।। अहो पुण्यमहो धर्म्यं नातः परतरं क्वचित्। अकृत्येषु च सर्वेषु प्रायश्चित्तमिदं परम्।।24।। सैकड़ो करोड़ जन्मों की तपस्या से जिन्होंने अपने सभी दुष्कर्म के फलों का नाश कर लिया है, वह कोई कोई प्राणवायु को नियंत्रित कर प्रत्यक्ष रूप में ब्रह्म का साक्षात्कार करते हैं। सुख, अमृत रस का आस्वादन और वास्तविक ज्ञान इन तीनों भेदों को एक रूप में अद्वैत की भावना का आश्रय लेकर विद्वान् स्वयं अनुभव करते हैं। अहो! यह पुण्य है, यह धर्म का फल है, इससे भिन्न कुछ भी नहीं सभी दुष्कर्मों में यही परम प्रायश्चित्त है। इत्यगस्त्यसंहितायां परमेश्वरस्वरूपाख्यानम् नाम द्वितीयोऽध्यायः।
- घ. स्व स्वकालेषु।